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घायल होकर अस्पताल पहुंचे पीड़ितों से ज्यादा पैसे ऐंठने का चलता है खेल

Sat, 09 Apr 2016 03:47 PM IST
सुशील पांडेय/अमर उजाला, नोएडा
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एक्सप्रेसवे - फोटो : अमर उजाला
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नोएडा सेक्टर-63 निवासी छात्र बबलू (17) जनवरी में नोएडा-ग्रेनो एक्सप्रेसवे पर ऑटो से जा रहा था। इस दौरान ट्रक ने ऑटो में टक्कर मार दी। परिजनों के मुताबिक , पास के प्राइवेट अस्पताल में जाते ही 60,000 रुपये जमा कराने को कहा गया। वहीं, 24 घंटे के अंदर अस्पताल ने करीब 1.5 लाख रुपये का बिल परिजनों के सामने रख दिया।
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हंगामा करने पर 85,000 रुपये लेकर अस्पताल ने मरीज को जाने दिया। जब परिजन दूसरे अस्पताल में गए तो वहां करीब 2.5 लाख रुपये चुकाने को कहा गया। अब तक परिवार ने करीब छह लाख रुपये इलाज में खर्च कर दिए हैं। अस्पताल वालों ने अनापशनाप बिल बनाकर पैसे ऐंठ लिए। यह एक उदाहरण मात्र है। नोएडा-ग्रेनो एक्सप्रेसवे व यमुना एक्सप्रेसवे पर होने वाले हादसों में घायलों से इलाज के नाम पर आसपास के निजी अस्पतालों की ओर से लाखों रुपये का बिल बनाने का खेल चल रहा है।

नये अस्पताल में ही क्यों ले जाती है पुलिस
जब भी दोनों एक्सप्रेसवे पर हादसा होता है तो पुलिस घायलों को प्राइवेट अस्पताल की ओर लेकर भागती है। ऐसे में सवाल उठता है कि पुलिस घायलों को साल-दो साल पहले शुरू हुए मध्यम दर्जे के नये प्राइवेट अस्पताल में ही ज्यादातर भर्ती क्यों कराती है? शुरू में ही सरकारी या बड़े अस्पताल में क्यों नहीं ले जाती? जानकारों की मानें तो हादसे में घायल मरीज की हालत को देखकर ही ज्यादातर प्राइवेट अस्पतालों और डॉक्टरों को अंदाजा हो जाता है कि इलाज संभव नहीं है। इसके कम से कम एक-दो दिन तक भी मरीज को अपने अस्पताल में रखकर ज्यादा से ज्यादा बिल बनाने की भरपूर कोशिश की जाती है।
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बीमे की राशि बताई तो गए काम से
अगर परिजनों ने अस्पताल प्रबंधन के सामने मरीज के बीमे की राशि को खोल दिया तो पैसे ऐंठने का ज्यादा मौका मिल जाता है। अस्पताल की ओर से ज्यादा से ज्यादा राशि का बिल बनाने की कोशिश की जाती है। यही नहीं मरीज के परिजन भी पैसे देने में संकोच नहीं करते, लेकिन गरीबों के मामले में, जिन्हें नकद राशि देनी होती है, यह परेशानी का सबब बन जाता है।

पैनल वाले अस्पताल करते हैं ज्यादा चार्ज
पैनल से जुड़े एक शख्स ने बताया कि अगर मरीज को ऐसे अस्पताल में भर्ती कराया जाता है जो किसी न किसी पैनल में शामिल है तो उसकी ओर से ज्यादा से ज्यादा चार्ज किया जाता है, चूंकि अस्पताल को पता होता है कि इस मरीज का बिल वह संस्थान चुकाएगा, जो उसके पैनल में शामिल है। ऐसे में उनकी ओर से ज्यादा से ज्यादा पैसे वसूलने की कोशिश की जाती है।

ऑपरेशन, गेस्ट डॉक्टर की फीस सबसे ज्यादा
पेशे से जुड़े लोग बताते हैं कि मरीज जब हादसे में घायल हो कर आता है तो ऐसे प्राइवेट अस्पताल ऑपरेशन के नाम पर मनमाना चार्ज करते हैं। यही नहीं आईसीयू और गेस्ट डॉक्टर के नाम पर भी खूब पैसे वसूले जाते हैं। परिजनों को पता भी नहीं चलता कि मरीज को कौन-कौन से डॉक्टरों ने देखा है। यही नहीं डॉक्टरों के हर बार की विजिट के अलग से पैसे लगते हैं।

18-30 वर्ष के युवकों की मौत सबसे ज्यादा
नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के आंकड़ों पर नजर डालें तो वर्ष 2014 में 18-30 वर्ष के 32.57 प्रतिशत लोगों की मौत सड़क हादसों में हुई है। इसके बाद 30-44 वर्ष के 31.75 प्रतिशत लोगों का नंबर मृतकों में आता है। 45-59 वर्ष के 17.51 प्रतिशत लोगों की मौत हादसों में हुई है। 18 वर्ष से कम उम्र के 11.93 युवा मौत के शिकार हुए हैं। अधिकांश प्राइवेट अस्पतालों का व्यवसायीकरण हो चुका है। यहां अमूमन मरीज की आर्थिक हालत देखकर इलाज होता है। मरीजों से मनमर्जी के पैसे वसूले जात हैं।- अनूप खन्ना, समाजसेवी
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