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-किशोरावस्था में बढ़ता मानसिक संकट एनजायटी और डिप्रेशन की चपेट में बच्चे
-किशोरावस्था के दौरान अधिक अपेक्षाएं देती हैं एंजायटी और डिप्रेशन को न्यौता
सोनम प्रतिहस्त
नई दिल्ली।
किशोरावस्था के दौरान बच्चों में मानसिक समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं। किशोरावस्था के दौरान हार्मोनल बदलाव से अपेक्षाएं बढ़ जाती हैं। उनकी भावनाओं को न समझना और शरीर में होने वाले हार्मोनल बदलाव बच्चों को भीतर ही भीतर तनाव में डाल रहे हैं। कई मामलों में बच्चे अपनी परेशानी किसी से साझा भी नहीं कर पा रहे हैं। पूर्वी दिल्ली स्थित मानव व्यवहार एवं संबंद्ध संस्थान में काउंसलिंग के दौरान विशेषज्ञों ने बताया कि किशोरावस्था के दौरान बच्चों से समय पर संवाद और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी मदद न मिलने पर यह समस्या गंभीर रूप ले सकती है। विशेषज्ञों के अनुसार बच्चों के व्यवहार में अचानक बदलाव मानसिक परेशानी का संकेत हो सकता है। लगातार चुप रहना, चिड़चिड़ापन, नींद और भूख में कमी, पढ़ाई से दूरी और खुद को दूसरों से अलग रखना ऐसे संकेत हैं, जिन पर अभिभावकों और शिक्षकों को ध्यान देना चाहिए।
जब हंसता-खेलता बच्चा अचानक रहने लगा चुप
ईस्ट दिल्ली के दिलशाद गार्डन स्थित एक सरकारी स्कूल में पढ़ने वाला 15 वर्षीय छात्र पहले काफी मिलनसार था। दोस्तों के साथ खेलना, पढ़ाई में रुचि और घर में हंसी-मजाक उसकी पहचान थी। अब बीते कुछ महीनों में उसके व्यवहार में अचानक बदलाव आ गया। घर पर अपने 10 वर्षीय छोटे भाई से हर बात में तुलना करने लगा। साथ ही अपने माता-पिता से भी नाराज रहने लगा। वह धीरे-धीरे अकेला रहने लगा, बात-बात पर चिड़चिड़ापन और रात को नींद न आना उसकी दिनचर्या बन गई। स्कूल जाने से कतराने लगा और घर में भी कम बोलने लगा। परिजनों के अनुसार बच्चा अक्सर कहता था कि कोई उसे समझ नहीं पाता। बाद में पता चला कि वह लंबे समय से मानसिक तनाव और चिंता से गुजर रहा था।
पढ़ाई का दबाव बना डिप्रेशन की वजह
पूर्वी दिल्ली के गोकुलपुरी इलाके की रहने वाली 14 वर्षीय छात्रा पढ़ाई में हमेशा आगे रही। बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद और तुलना के दबाव ने धीरे-धीरे उसे तनाव में डाल दिया। किशोरावस्था के दौरान शरीर में हो रहे हार्मोनल बदलाव और भावनात्मक असंतुलन ने उसकी परेशानी और बढ़ा दी। परिजनों ने बताया कि बच्ची अक्सर बेचैन रहती, बिना वजह रोने लगती और खुद को दूसरों से कमतर समझने लगी थी। सोशल मीडिया पर साथियों से तुलना के कारण उसका आत्मविश्वास भी कमजोर हो गया। समय पर ध्यान न देने पर बच्ची में डिप्रेशन के लक्षण साफ नजर आने लगे।
किशोरावस्था है बच्चों के जीवन का संवेदनशील दौर
डॉक्टरों ने कहा कि अभिभावकों को बच्चों से खुलकर बातचीत कर उनकी भावनाओं को समझने की कोशिश करनी चाहिए। पढ़ाई या प्रदर्शन को लेकर अत्यधिक दबाव बनाने से बचें। जरूरत पड़ने पर समय रहते काउंसलिंग और विशेषज्ञ की मदद लेना बेहद जरूरी है। किशोरावस्था बच्चों के जीवन का सबसे संवेदनशील दौर है।