पहले जमीन खरीदना मुश्किल था, लेकिन अब मकान बनाना भी मुश्किल हो गया है। इसका एक कारण ईंट का तीन गुना तक महंगा होना भी है। आज एक ईंट आठ से दस रुपये की पड़ रही है।
दरअसल, नोएडा का विस्तार हुआ तो भट्टे ग्रेटर नोएडा की तरफ चले गए। ग्रेटर नोएडा शहर बना तो ये यमुना प्राधिकरण क्षेत्र की तरफ शिफ्ट हो गए।
पांच साल में ईंटों की कीमत में तीन गुना तक की वृद्धि हुई है। इसका सबसे बड़ा कारण घटती जमीन और दूर होते भट्टे हैं। नोएडा में जमीन के भाव आसमान छू रहे हैं। ऐसे में कई बीघा जमीन पर भट्टे चलाना मुश्किल होता गया।
आसपास के क्षेत्र के भट्टे बंद हो गए या फिर कई किलोमीटर दूर चले गए। अब ईंट 40 किलोमीटर से कहीं अधिक दूरी पर मिलती है। जितनी कीमत भट्टे पर ईंटों की होती है, करीब उतनी राशि उन्हें लाने-ले जाने में खर्च होती है।
वर्तमान में कोयले से पकी एक हजार ईंटों का भाव पांच से छह हजार रुपये के बीच में है। नोएडा लाने में एक से दो हजार रुपये प्रति वाहन मालिक को देना पड़ता है। कुल मिलाकर एक ईंट की कीमत आठ से दस रुपये केलगभग पड़ती है।
नोएडा में खत्म हुए भट्टे
80-90 के दशक में नोएडा में काफी भट्टे थे। सन् 2000 आते-आते जमीन के भाव बढ़ने लगे। इसका नतीजा ये हुआ कि भट्टा मालिकों ने यहां से पलायन करना शुरू कर दिया। वर्तमान में नोएडा में भट्टे खत्म हो चुके हैं। स्थानीय निवासियों को ईंट लाने के लिए करीब 40 किलोमीटर दूर दनकौर-रबूपुरा क्षेत्र में जाना पड़ता है।
करीब सौ भट्टे हैं जिले में
ग्रेटर नोएडा के क्षेत्र रबूपुरा, दनकौर, जेवर, दादरी आदि में भट्टों की संख्या करीब सौ है। एक-दूसरे से कंपटीशन के चलते ईंटें सस्ती बेचने के लिए कुछ लोग तुरी और उपलों से भी ईंटें पकाते हैं, लेकिन कोयले की पकी ईंट मजबूत और बेहतर होती है। यह महंगी भी पड़ती है। दादरी के एनटीपीसी से निकलने वाली राख से भी ईंटें बनती हैं, लेकिन कम मजबूत होती हैं।
कोयला तेजी से महंगा हुआ है और कर्मचारियों का मेहनताना भी बढ़ा है। ऐसे में कीमत बढ़ना तय है। साथ ही ज्यादा दूर लाने ले जाने में भी खर्चा आता है, जो खरीदार को उठाना पड़ रहा है।
- रजनीकांत अग्रवाल, महासचिव, भट्टा एसोसिएशन, गौतमबुद्धनगर
वेबसाइट पर नहीं है डाटा
एनजीटी के निर्देश के बावजूद अभी तक जिले के ईंट भट्टों का डाटा उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की वेबसाइट पर नहीं डाला गया है, जबकि अन्य क्षेत्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड का डाटा अपलोड़ किया जा चुका है। क्षेत्रीय प्रदूषण अधिकारी अतुलेश यादव के मुताबिक यहां से डाटा भेजा जा चुका है। पता नहीं अभी तक अपलोड क्यों नहीं हुआ।