राजधानी निवासियों ने आधुनिकता एवं तरक्की के बीच होली खेलने का ट्रेंड भी बदल दिया है। इस मामले में गांव वाले भी पीछे नहीं रहे है। अब शहर हो या गांव या फिर कालोनी सभी जगह महिलाओं की टोलियां हाथ में कोलड़ा लेकर पुरुषों को मारने के लिए नहीं दौड़ती हैं और न ही होली खेलने के लिए पुरूषों की ओर से आमंत्रित किया जाता है।
अब कुछ देर तक घरों में ही एक-दूसरे पर रंग एवं गुलाल लगाकर होली खेलते हैं। इस दौरान घर परिवार के ही लोग उपस्थित रहते हैं। वर्षों पहले फाल्गुन माह शुरू होते ही होली त्यौहार की झलक दिखाई देनी शुरू हो जाती थी।
महिलाएं अपने देवरों को भीगोने का सिलसिला आरंभ कर देती थी। यह सिलसिला होली के दिन तक जारी रहता था। वहीं दुलंडी के दिन पूरे गांवों की महिलाएं एवं पुरूष टोलियों में होली खेलने के लिए तालाब के पास पहुंचते थे।
इसी बीच जल बोर्ड की ओर से घरों में पानी की आपूर्ति शुरू करने के चलते उन्होंने अपने मोहल्ले में होली खेलनी आरंभ कर दिया। इस दौरान महिलाओं पर पुरूष पानी डालते थे और महिलाएं उनको कोलड़ा मारती थी।