केंद्रीय शहरी विकास मंत्री वेंकैया नायडू ने जब दिल्ली का नाम बदलने की बात कही तो इतिहासकारों की राय उनसे बहुत अलग निकली। दिल्ली को दिल्ली ही रहने दो कोई और नाम ना दो पर सभी विश्वास करते हैं।
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लेखक और इतिहासकार विलियम डैलरिंपल से जब नायडू के विचार के बारे में बात की गई तो उन्होंने साफ-साफ ये कहा कि, 'जब शाहजहां दिल्ली का नाम नहीं बदल सका तो ये आज के राजनीतिज्ञ क्या दिल्ली का नाम बदल सकेंगे?'
मालूम हो कि केंद्रीय मंत्री वेंकैया नायडू ने अपने एक सवाल से बहस छेड़ दी है, जिसमें उन्होंने दिल्ली का नाम इंद्रप्रस्थ या हस्तिनापुर में से कौन सा बेहतर होगा पूछा था।
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एक अन्य प्रख्यात इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने कहा है कि मंत्री जी को अपना कीमती समय शहर के विकास के लिए केंद्रित करना चाहिए ना कि शहरों के नाम बदलने पर। इसी के साथ गुहा ने यह सुझाव जरूर दिया कि इसे 'दिल्ली' किया जाना ज्यादा अच्छा होगा जैसे कि बेंगलुरू, कोलकाता और मुंबई का हुआ है।
पहले भी हो चुकी हैं ऐसी कोशिशें
नेशनल कैपिटल ऑफ डेल्ही लॉ के दूसरे बिल(संशोधन) के पास होने के दौरान मंगलवार को लोकसभा में नायडू ने एक इस मुद्दे को उछाला था। उन्होंने कहा था कि महाभारत काल में दिल्ली के लिए जो नाम प्रयोग में लाए गए थे वह बहुत उपयुक्त हैं। इसके साथ ही उन्होंने यह भी साफ कर दिया था कि 'मैं यहां कोई प्रस्ताव नहीं रख रहा हूं।'
डेलरिंपल से पूछने पर उन्होंने कहा कि हस्तिनापुर कभी भी दिल्ली के पास नहीं था। इंद्रप्रस्थ सही नाम है जो बहुत सारी यादें अपने आप में संजोए हुए है। हालांकि राजनीतिज्ञ कितनी भी कोशिश कर लें दिल्ली, दिल्ली ही रहेगी।
उन्होंने अपनी बात को जोरदार तरीके से रखते हुए कहा कि दिल्ली का नाम बदलने की ऐसी कई कोशिशें शताब्दियों पहले भी हो चुकी हैं पर दिल्ली इन सबसे बाहर निकल आई। तुगलकों ने इसका नाम फिरोजाबाद रखने की कोशिश की और शाहजहां ने शाहजहांनाबाद पर वह दोनों ही कामयाब नहीं हो सके।
सबसे पहले दिल्ली थी 'ढिल्ली'
इतिहासकार उपिंदर सिंह ने अपनी किताब 'डेल्ही इन हर बुक' में दिल्ली के नाम का वर्णन किया है। उन्होंने अपनी किताब में लिखा है कि दिल्ली का सबसे पुराना उल्लेख 'ढिल्ली' या 'ढिल्लिका' के रूप में 12वीं शताब्दी के बिजोलिया के अवशेषों से मिलता है जो राजस्थान में है।
यह चौहान राजा विग्रहराज के संबंध में है कि उन्होंने ढिल्लिका को जीत लिया था। 12वीं शताब्दी में लिखे गए ग्रंथ पृथ्वीराज रासो में उल्लिखित 'किल्ली ढिल्ली कथा' भी ढिल्ली को राजपूत राजा अनंगपाल और मेहरौली के लौहस्तंभ से जोड़ती है। इस संबंध में एक रोचक कहानी भी है जिसे आप आगे पढ़ सकते हैं।
ऐसे पड़ा नाम ढिल्ली
इस ग्रंथ में लिखा है कि एक ब्राह्मण अनंगपाल को बताता है कि लौह स्तंभ की जड़ें जमीन में बहुत नीचे तक गई हुई हैं और वासुकी नाग के फन पर टिकी हुई हैं और इसे हिलाया भी नहीं जा सकता।
इस बात पर राजा अनंगपाल ने निश्चय किया कि वह लौह स्तंभ खोदकर रहेंगे। उन्होंने ऐसा किया भी पर जब वह उपर आया तो उसमें सांप का खून भी लगा हुआ था।
तब राजा ने उसे वापस रखने की कोशिश की पर वह ढिल्ली(ढीला) ही रह गया। कहा जाता है कि लौहस्तंभ के दोबारा गाड़े जाने पर उसके ढीला रहने के कारण ही इस शहर का नाम ढिल्ली पड़ा।
राजा दिलीप ने बसाया था ये शहर!
उपिंदर आगे बताते हैं कि, इसके बाद ढिल्ली का उल्लेख पालम बाओली के शिलालेखों पर मिलता है जो पालम गांव में है। शिलालेखों के अनुसार इस बाओली का निर्माण ढिल्ली के रहने वाले उद्धार द्वारा करवाया गया था। ढिल्ली और ढिल्ली नाम उल्लेख 12वीं से 14वीं शताब्दी के शिलालेखों में मिलता है।
इस नाम का उल्लेख पारसी खातों में भी मिलता है जिसमें ढिल्ली नाम के एक राज का वर्णन है। इसके साथ ही किंवदंती है कि इस शहर की स्थापना राज दिलीप ने की थी। यहां यह बात ध्यान देने योग्य है कि इन शिलालेखों में दिल्ली के किस हिस्से या क्षेत्र का उल्लेख है यह कह पाना काफी मुश्किल है।
वहीं दिल्ली के कंवेनर एजीके मेनन का कहना है कि किसी जगह के नाम बदलने का मकसद उस जगह के इतिहास को बदलना होता है। लेकिन दिल्ली में ऐसा कुछ नहीं होने वाला। मैं व्यक्तिगत रूप से इसके खिलाफ हूं। दिल्ली किसी भी नाम से पुकारी जाए पर इसकी विरासत वही रहेगी।
-पृथ्वीराज चौहान ने लालकोट का विस्तार किया और उनके शहर का नाम रखा गया किला राय पिथोरा। इसे दिल्ली का पहला शहर माना जाता है।
-अलाउद्दीन खिलजी ने सिरी के गढ़ का विस्तार किया, जिसे लंबे समय तक मंगोलों के अधीन रहना पड़ा।
-तुगलकाबाद दिल्ली का तीसरा शहर था जिसे सुल्तान घियासुद्दीन तुगलक ने बसाया था।
-घियासुद्दीन के भतीजे मुहम्मद बिन तुगलक ने एक और शहर बसाया था जिसे जहांपना कहते थे। लेकिन इस ध्वस्त हो जाने और किसी भी तरह का अवशेष ना होने के कारण इसे अब शहर नहीं माना जाता।
-फिरोजाबाद को फिरोजशाह तुगलक ने बसाया था। आज इसे कोटला फिरोजशाह के रूप में जाना जाता है।
-मुगल बादशाह हुमायूं ने दिल्ली का पांचवां शहर बसाया था, जिसका नाम दीनपनाह रखा था। इसे शेरशाह सूरी ने ध्वस्त करके उसकी जगह पुराना किला या शेरगढ़ बनाया था। जब हुमायूं दोबारा शासन में आया तो उसने किले में कुछ बदलाव करवाए थे।
-बादशाह शाहजहां ने एक बिल्कुल अलग और सुव्यवस्थित शहर बनाया था जिसे उन्होंने शाहजहांनाबाद का नाम दिया था।
-अंग्रेजों ने अपने राज के दौरान राजधानी दिल्ली बन जाने के बाद उन्होंने दिल्ली को दोबारा बनाने की सोची। जैसे कि कहा गया है कि पहले उन्होंने इसे जॉर्जाबाद नाम देने कि सोची जो किंग जॉर्ज पंचम के नाम पर रखा जाता। लेकिन बाद उन्होंने इसे नई दिल्ली नाम देना मंजूर किया।