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हाईकोर्ट: दिल्ली पुलिस की बातों पर विश्वास नहीं किया जा सकता

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जेएनयू नारेबाजी विवाद में आरोपी कन्हैया कुमार की जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने दिल्ली पुलिस की जांच पर कई बार सवाल उठाया।
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कोर्ट ने सुनवाई करते हुए यहां तक कह दिया कि दिल्ली पुलिस की बातों पर विश्वास नहीं किया जा सकता। अगर एसएचओ गेट पर मौजूद थे, तो नकाबपोश कैसे अंदर आए और फिर बाहर कैसे चले गए।

जस्टिस प्रतिभा रानी ने कहा कि अगर पुलिस घटना के दौरान परिसर में मौजूद थी, तो वहीं पर कन्हैया कुमार पर कार्रवाई क्यों नहीं की गई।

नकाबपोश अंदर कैसे आए और वापस कैसे चले गए

एसएचओ व अन्य पुलिसकर्मी गेट पर मौजूद थे, तो बाहरी लोग व नकाबपोश अंदर कैसे आए और वापस कैसे चले गए। यदि वे लोग पकड़े ही नहीं गए, तो उन्हें कन्हैया के साथ कैसे जोड़ सकते हैं।

यह कैसे कह सकते हैं कि कन्हैया ने उन्हें बुलाया था। इस पर पुलिस ने कोर्ट को बताया कि छात्रों में झड़प व नारेबाजी की सूचना पाकर जेएनयू के सुरक्षा प्रभारी मौके पर पहुंचे थे और मोबाइल से वीडियो भी बनाया था।

उसके मोबाइल से वीडियो कॉपी किया गया था। पुलिस को भी सूचना दी गई थी। कोर्ट ने पूछा कि उक्त मोबाइल को फोरेंसिक जांच के लिए क्यों नहीं भेजा गया।

पुलिस ने कहा कि उसके पास वीडियो नहीं है, लेकिन कई गवाह हैं

इस पर पुलिस ने कहा कि मोबाइल जांच के लिए लैब भेजा गया था, लेकिन संबंधित तकनीक नहीं होने के कारण मोबाइल वापस आ गया। कोर्ट ने कहा कि इस तरह तो मोबाइल के वीडियो से भी छेड़छाड़ की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने पूछा कि कन्हैया के बारे में कोई वीडियो या प्रत्यक्ष साक्ष्य है। इसके जवाब में पुलिस ने कहा कि उसके पास वीडियो नहीं है, लेकिन कई गवाह हैं, जिन्होंने उसे नारेबाजी करते हुए देखा।

कोर्ट ने पुलिस की मंशा पर सवाल उठाते हुए कहा कि जब सुरक्षा प्रभारी ने मोबाइल पर वीडियो बनाया, तो उसके आधार पर केस दर्ज क्यों नहीं किया। पुलिस भी वहां मौजूद थी, लेकिन किसी पुलिसकर्मी का बयान नहीं लिया गया।

कार्यक्रम के लिए उसने अनुमति नहीं मांगी

पुलिस की इन बातों पर विश्वास नहीं किया जा सकता। पुलिस ने एफआईआर में पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगने की बात कही है, लेकिन स्टेटस रिपोर्ट में इसका जिक्र नहीं है।

दिल्ली सरकार की ओर से पेश हुए अधिवक्ता राहुल मेहरा ने कहा कि पुलिस के पास कोई साक्ष्य नहीं है। कार्यक्रम के लिए उसने अनुमति नहीं मांगी और पोस्टर में भी उसका नाम नहीं था।

उसने इन पोस्टरों को बांटा भी नहीं था। इन तथ्यों के मद्देनजर कन्हैया को जमानत दी जानी चाहिए। दिल्ली पुलिस ने इसका विरोध करते हुए कहा कि कन्हैया पर देशद्रोह का आरोप है और यह बेहद गंभीर आरोप है। अगर उसे जमानत दी गई, तो पूरे देश में आंदोलन खड़ा हो जाएगा।

इस केस में कितनी गंभीरता है, यह बताइए।

कोर्ट ने इस पर पूछा कि देशद्रोह के मामले में तीन साल कैद व जुर्माने की सजा से लेकर आजीवन कारावास तक हो सकती है। यह केस की गंभीरता पर निर्भर करता है। इस केस में कितनी गंभीरता है, यह बताइए।

पुलिस ने कहा कि कन्हैया की नारेबाजी और गिरफ्तारी के बाद कोलकाता की जाधवपुर यूनिवर्सिटी व दूसरे कई संस्थानों में ऐसी ही नारेबाजी व प्रदर्शन हुए थे। उसकी नारेबाजी ने दूसरे छात्रों को भड़काया था। बचाव पक्ष ने कहा कि देशद्रोह की धारा बेहद अप्रासंगिक है।

इस धारा को ब्रिटिश सरकार ने भी खत्म करने की सिफारिश की थी। कन्हैया के खिलाफ कोई साक्ष्य नहीं है, अगर उसके खिलाफ संज्ञेय मामला बनता था, तो उसे मौके पर गिरफ्तार कर केस दर्ज क्यों नहीं किया गया। इसके लिए दो दिन इंतजार क्यों किया गया।
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कन्हैया पर दिए बयान पर बस्सी को राहत

जेएनयू नारेबाजी विवाद में देशद्रोह के आरोपों का सामना कर रहे कन्हैया पर पूर्व पुलिस आयुक्त बीएस बस्सी द्वारा दिए गए बयान के खिलाफ दायर याचिका सोमवार को हाईकोर्ट ने खारिज कर दी। बस्सी को यह राहत उनके सेवानिवृत्त होने वाले दिन मिली। हाईकोर्ट ने कहा कि मीडिया में दिए बयानों पर आधारित याचिका को नहीं सुना जा सकता। यह याचिका जनहित में नहीं बल्कि प्रसिद्धि पाने की मंशा से दायर की गई है।

हाईकोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि वह याचिका पर सुनवाई कर अदालत का बोझ नहीं बढ़ाना चाहती। कोर्ट ने याची से पूछा क्या समाचार पत्रों में छपी खबरों के अलावा भी उसके पास कोई अन्य साक्ष्य है। कोर्ट ने हैरानी जाहिर करते हुए कहा कि उसे समझ में नहीं आ रहा कि यह याचिका क्यों दायर की गई है। सुप्रीम कोर्ट में जेएनयू का मुद्दा लंबित है और अभी मामले की जांच चल रही है।

पेश मामले में अधिवक्ता सतीश पांडे ने याचिका दायर की थी। याची ने पुलिस आयुक्त पर केंद्र सरकार व कुछ राजनीतिक पार्टियों के इशारों पर काम करने का आरोप लगाया था। याचिका में कहा गया कि पुलिस आयुक्त ने यह बयान दिया था कि वह कन्हैया की जमानत याचिका का विरोध नहीं करेंगे। याची ने दावा किया था कि पुलिस आयुक्त के इस बयान से मामले की निष्पक्ष जांच व सुनवाई पर असर पड़ेगा।
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