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Delhi: निजी स्कूलों के ईडब्ल्यूएस छात्रों के बाजारीकरण पर हाईकोर्ट ने दिल्ली सरकार से मांगा जवाब, पढ़ें मामला

Wed, 27 Aug 2025 10:10 PM IST
आकाश दुबे अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली

सार

शिक्षा मंत्रालय और सीबीएसई के बार-बार नीतिगत हस्तक्षेपों के बावजूद, निजी स्कूल अनियंत्रित निजी प्रकाशकों की किताबें निर्धारित कर रहे हैं, जिनकी लागत प्रति वर्ष 12,000 रुपये तक है, जबकि एनसीईआरटी की किताबें 700 रुपये से कम में उपलब्ध हैं।
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दिल्ली हाईकोर्ट - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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दिल्ली हाई कोर्ट ने बुधवार को एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए दिल्ली सरकार, केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) और राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) को नोटिस जारी किया। याचिका में निजी स्कूलों द्वारा आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (ईडब्ल्यूएस) के छात्रों के खिलाफ बाजारीकरण और बहिष्कार का आरोप लगाया गया है, जो महंगे निजी प्रकाशकों की किताबें और अत्यधिक कीमत वाले शैक्षणिक सामग्री खरीदने के लिए मजबूर किए जा रहे हैं। मुख्य न्यायाधीश डी.के. उपाध्याय और न्यायमूर्ति तुषार राव गेदेला की खंडपीठ ने चार सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया और याचिका को 12 नवंबर के लिए सूचीबद्ध किया। 

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याचिकाकर्ता जसमीत सिंह साहनी ने दावा किया कि शिक्षा का अधिकार (आरटीई) अधिनियम के तहत चयनित ईडब्ल्यूएस या वंचित समूह के छात्रों को या तो प्रवेश से वंचित किया जा रहा है या निजी प्रकाशकों की महंगी किताबें और स्कूल किट की लागत वहन न कर पाने के कारण उन्हें वापस हटने के लिए मजबूर किया जा रहा है। शिक्षा मंत्रालय और सीबीएसई के बार-बार नीतिगत हस्तक्षेपों के बावजूद, निजी स्कूल अनियंत्रित निजी प्रकाशकों की किताबें निर्धारित कर रहे हैं, जिनकी लागत प्रति वर्ष 12,000 रुपये तक है, जबकि एनसीईआरटी की किताबें 700 रुपये से कम में उपलब्ध हैं। याचिका में यह भी बताया गया कि दिल्ली सरकार केवल 5,000 रुपये की वार्षिक प्रतिपूर्ति प्रदान करती है, जिसके कारण एक असमनीय अंतर पैदा होता है, जो ईडब्ल्यूएस परिवारों को प्रवेश वापस लेने के लिए मजबूर करता है और वंचित बच्चों के लिए 25 प्रतिशत आरक्षण का आदेश विफल हो जाता है।
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