याचिकाकर्ता जसमीत सिंह साहनी ने दावा किया कि शिक्षा का अधिकार (आरटीई) अधिनियम के तहत चयनित ईडब्ल्यूएस या वंचित समूह के छात्रों को या तो प्रवेश से वंचित किया जा रहा है या निजी प्रकाशकों की महंगी किताबें और स्कूल किट की लागत वहन न कर पाने के कारण उन्हें वापस हटने के लिए मजबूर किया जा रहा है। शिक्षा मंत्रालय और सीबीएसई के बार-बार नीतिगत हस्तक्षेपों के बावजूद, निजी स्कूल अनियंत्रित निजी प्रकाशकों की किताबें निर्धारित कर रहे हैं, जिनकी लागत प्रति वर्ष 12,000 रुपये तक है, जबकि एनसीईआरटी की किताबें 700 रुपये से कम में उपलब्ध हैं। याचिका में यह भी बताया गया कि दिल्ली सरकार केवल 5,000 रुपये की वार्षिक प्रतिपूर्ति प्रदान करती है, जिसके कारण एक असमनीय अंतर पैदा होता है, जो ईडब्ल्यूएस परिवारों को प्रवेश वापस लेने के लिए मजबूर करता है और वंचित बच्चों के लिए 25 प्रतिशत आरक्षण का आदेश विफल हो जाता है।