अदालत ने कहा पत्नी ने दस्तावेजों को रिकॉर्ड पर रखते हुए स्पष्ट रूप से साबित कर दिया है कि याचिकाकर्ता एक अच्छा वेतन अर्जित करने में सक्षम है। याचिकाकर्ता ने यह भी स्वीकार किया कि वह लगभग 30 हजार रुपये प्रति माह कमा रहा था। ऐसे में याचिकाकर्ता का यह तर्क स्वीकार करने योग्य नहीं है कि वह दिल्ली सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम मजदूरी के बराबर कमा रहा है, यह अस्वीकार्य है।
अदालत ने कहा याचिकाकर्ता का जीवन स्तर न्यायालय से प्रासंगिक जानकारी को छिपाने में उसका आचरण और यह तथ्य कि वह न केवल योग्य है बल्कि अच्छा पैसा कमाने में सक्षम है। ऐसे में फैमिली कोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं है।
क्या है मामला
दोनों का विवाह 25 अक्तूबर 2015 को हुआ था, बाद में आपसी विवाद होने पर दोनों अलग रहने लगे। महिला ने फैमिली कोर्ट में याचिका दायर कर गुजारे भत्ते की मांग की। उसने पति पर मानसिक व शारीरिक प्रताड़ना का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि उनके पति गुरुग्राम में एनआईआईटी कंपनी में ग्राफिक डिजाइनर की नौकरी कर रहे हैं और 40 हजार रुपये प्रति माह कमा रहे हैं। इसके अलावा होशियारपुर, पंजाब से किराए के रूप में 40 हजार रुपये प्रति माह की आय हो रही है। उसके पति का अपना आवासीय आवास है व उनके पति पर कोई देनदारी नहीं है और उनके पति की मां को भी 25,000 रुपये प्रति माह की पेंशन मिल रही है और वह इकलौता बेटा है।वहीं दूसरी तरफ की कोई आय नहीं है और अपनी विधवा मां के पास रह रही है। उसने अदालत से गुजाराभत्ता के लिए प्रति माह 40 हजार रुपये व 25 हजार रुपये कानूनी खर्च के दिलवाने का आग्रह किया।
पति ने सभी आरोप झूठे बताते हुए कहा कि पत्नी उसे मानसिक क्रूरता और यातना पंहुचा रही है और उसने बिना कारण घर छोड़ दिया। उसकी पत्नी ने सीएडब्ल्यू प्रकोष्ठ के समक्ष झूठी शिकायत की और उसके बाद वह स्वयं सीएडब्ल्यू प्रकोष्ठ द्वारा की जा रही परामर्श कार्यवाही के दौरान अनुपस्थित रही। वर्तमान में उनक नौकरी चली गई व बेरोजगार हो गए। वहीं पत्नी अच्छी तरह से योग्य है और अच्छी कमाई कर रही है, इसलिए वह किसी भी रखरखाव के लिए हकदार नहीं है।
फैमिली कोर्ट ने सभी तथ्यों को देखने के बाद कहा कि पत्नी भरण-पोषण के लिए प्रति माह 10,000 रुपये की राशि की हकदार है।पति ने इस फेसले को हाईकोर्ट में चुनौती देते हुए फैसले को गलत बताया।