लोग अपनी मर्जी से झुग्गी-झोपड़ियों में नहीं रहते
अदालत ने कहा जब गरीब और वंचित न्यायालय के दरवाजे पर दस्तक देते हैं, तो न्यायालय को समान रूप से संवेदनशील होने की आवश्यकता होती है। न्यायालय को इस तथ्य के प्रति जागरूक रहने की आवश्यकता होती है कि ऐसे वादियों के पास संपूर्ण कानूनी संसाधनों तक पहुंच नहीं होती। अदालत ने कहा झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले लोग अपनी मर्जी से झुग्गी-झोपड़ियों में नहीं रहते।
कॉलोनी का नाम शहीद बस्ती ही रहा
न्यायमूर्ति हरि शंकर पांच लोगों की याचिका पर यह फैसला दिया। याची ने दावा किया गया था कि वे 1980 के दशक से नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के पास शहीद बस्ती झुग्गी बस्ती के निवासी थे। 2002-2003 में जब भारतीय रेलवे नई दिल्ली रेलवे स्टेशन को विश्व स्तरीय रेलवे स्टेशन में बदलने की कोशिश कर रहा था और प्लेटफॉर्मों की संख्या बढ़ाने के लिए उन्होंने स्लम भूमि का अधिग्रहण करने की योजना बनाई। उन्हें लाहौरी गेट पर स्थित पटरियों के दूसरी तरफ स्थानांतरित कर दिया और वहां एक झुग्गी बस्ती की स्थापना की, कॉलोनी का नाम शहीद बस्ती ही रहा।
आधुनिकीकरण के लिए क्षेत्र को भी साफ़ करने की आवश्यकता थी
याची ने कहा हालांकि स्टेशन के और आधुनिकीकरण के लिए अधिकारियों को लाहौरी गेट के आसपास के उस क्षेत्र को भी साफ़ करने की आवश्यकता थी, जिसके लिए 14 जून, 2008 को वहां की झुग्गी को ध्वस्त कर दिया गया। याचिकाकर्ताओं द्वारा यह तर्क दिया गया था कि स्लमवासियों के पुनर्वास की नीति के तहत पूर्व सर्वेक्षण के बिना उनकी बेदखली नहीं की जा सकती थी। वहीं, रेलवे ने तर्क दिया कि पुनर्वास नीति में केवल झुग्गी-झोपड़ियों के निवासियों के पुनर्वास की परिकल्पना की गई थी जो 30 नवंबर, 1998 को या उससे पहले स्थापित किए गए और लाहौरी गेट पर याचिकाकर्ताओं के घर केवल 2003 में स्थापित किए गए। रेलवे ने कहा कि सर्वेक्षण करने की आवश्यकता केवल पात्र स्लम समूहों पर लागू होती है जो कट-ऑफ तिथि से पहले थे।
इसकी कल्पना करने का एक छोटा सा प्रयास भी हमारे लिए काफी
यहां तक कि वे कैसे रहते हैं, इसकी कल्पना करने का एक छोटा सा प्रयास भी हमारे लिए काफी है। इसलिए हम ऐसा नहीं करना पसंद करते हैं। नतीजतन, अंधेरे के ये निवासी अपने अस्तित्व को दिन-ब-दिन नहीं, बल्कि अक्सर घंटे दर घंटे, अगर मिनट दर मिनट नहीं, तो अपने अस्तित्व को जारी रखते हैं।