अदालत ने कहा, एमसीडी को संबंधित जमीन पर हुए अनधिकृत निर्माण की सीमा का निरीक्षण करने तथा आसपास के क्षेत्रों के भी अवैध निर्माण का निरीक्षण करने का निर्देश दिया। साथ ही एमसीडी सहित संबंधित पुलिस अधिकारियों को हो रहे अनधिकृत निर्माण को रोकने का आदेश दिया। साथ ही स्पष्ट कर दिया कि जमीन के खसरा नंबरों के बारे में किसी भी भ्रम के कारण कार्रवाई में बाधा नहीं आनी चाहिए। अदालत ने निगम के अपीलीय प्राधिकरण को लंबित अपीलों पर जल्द सुनवाई कर आदेश पारित करने का निर्देश दिया।
अवैध निर्माण के खिलाफ एमसीडी ने बीते वर्ष 9 अक्टूबर को तोड़ने का आदेश दिया था। याचिकाकर्ता ने कहा कि इस आदेश के बावजूद एमसीडी ने वहां चल रहे अवैध निर्माण को रोकने के लिए कोई कदम नहीं उठाया। वहीं कथित अवैध निर्माणकर्ताओं ने एमसीडी के आदेश को उसके अपीलीय न्यायाधिकरण (एटीएमसीडी) के समक्ष अपील दाखिल की। न्यायाधिकरण ने उसके बाद 18 जनवरी को एमसीडी से जमीन के कब्जेदारों को अपना पक्ष रखने का अवसर देने को कहते हुए फिर से एक महीने में नया आदेश पारित करने को कहा। निगम ने उस समय सीमा का पालन नहीं किया और नए सिरे से 26 मार्च को फिर से अनाधिकृत निर्माण तोड़ने का आदेश दिया। इसको लेकर न्यायाधिकरण के पास एक और अपील दाखिल हो गई। वह अभी भी लंबित है।
कोर्ट ने कहा कि जमीन के कब्जेदार के आचरण, अनधिकृत निर्माण को जारी रखने के लिए प्राधिकारियों को कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए था, लेकिन उन्होंने कोई कार्रवाई नहीं की। एमसीडी के हलफनामे से पता चला है कि संपत्ति के कब्जेदार ने एमसीडी को जमीन का कोई निरीक्षण करने की अनुमति नहीं दी। अदालत ने इस तरह की विफलता पर कड़ी आपत्ति करते हुए कहा कि एमसीडी जैसा कोई प्राधिकरण अवैध निर्माण के खिलाफ कार्रवाई करने में अपनी ओर से असहायता का दावा करता है, तो इससे इस आरोप को बल मिलता है कि एमसीडी अधिकारी का अवैध निर्माताओं के साथ मिलीभगत है।