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यमुना की तलहटी में जमा हो रहीं भारी धातुएं

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राजधानी में यमुना का जीवन ही खत्म नहीं हो रहा है, इसकी तलहटी में नुकसानदेह भारी धातुएं भी जमा हो रही हैं। इसका सीधा असर यमुना खादर के जीवन पर पड़ रहा है। खादर में पैदा होने वाली सब्जियों से भारी धातुएं आम लोगों तक पहुंच रही हैं।
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इससे जलजनित बीमारियों के साथ कैंसर तक होने का खतरा बढ़ गया है। इसका खुलासा टॉक्सिक लिंक नामक संस्था की एक रिपोर्ट में हुआ है। लोदी एस्टेट स्थित डब्ल्यूडब्ल्यूएफ ऑफिस में आयोजित इंडिया रिवर वीक में सोमवार को रिपोर्ट जारी हुई।

टॉक्सिक लिंक ने जगतपुर गांव, वजीराबाद डैम की डाउन स्ट्रीम, विधानसभा, मजनूं का टीला, आईएसबीटी और यमुना विहार से साल में दो बार सैंपल लिया था। पहला मानसून से पहले और दूसरा मानसून के बाद। दोनों बार सभी प्वाइंट पर भारी धातुओं की मात्रा मानक से कहीं ज्यादा रही।
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रिपोर्ट के अनुसार, नदी की सतह पर मरकरी, लेड, कैडमियन, क्रोमियम और आर्सेनिक जैसी नुकसानदेह भारी धातुओं की मात्रा बहुत ज्यादा रही। इसकी वजह यह है कि दिल्ली के औद्योगिक क्षेत्रों से आने वाले गंदे पानी को बगैर साफ किए नदी में गिराया जा रहा है।

इससे भारी धातुएं लंबे समय तक नदी में बनी रहती है। वहीं, यमुना के पानी में सब्जियों का धुलना भी खतरनाक है। इस तरह के पानी में नहाने से भी आम लोगों की सेहत प्रभावित हो रही है। संस्था के प्रोग्राम कोआर्डिनेटर प्रशांत राजनकर बताते हैं कि भारी धातुओं से जुड़े उद्योगों के पानी को किसी भी हालत में सीवर सिस्टम में जाने रोका जाए।
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क्या है यमुना का भविष्य

जुदा नहीं भूजल आयोग की राय

केंद्रीय भूजल आयोग ने देश की नदियों में भारी धातुओं की मात्रा पर शोध किया था। पिछले दिनों इसकी रिपोर्ट जारी हुई। इसमें सभी नदियों में भारी धातुओं की मात्रा मानके से ज्यादा पाई गई। खास तौर से आर्सेनिक, क्रोमियम, कैडमियम, कॉपर, आयरन, लेड, मरकरी, निकल, जिंक जैसी धातुओं से नदी का पानी प्रदूषित है।

इंडिया वाटर वीक शुरू

नदियों के साथ हमारा व्यवहार बेहद लापरवाही भरा और अशिष्ट है। इस माहौल में इंडिया रिवर्स वीक और इंडिया रिवर्स फोरम अच्छी पहल है। डब्ल्यूडब्ल्यूएफ ऑडिटोरियम में सोमवार को इंडिया रिवर्स वीक की शुरुआत करते हुए यह बातें पूर्व केंद्रीय मंत्री जयराम रमेश ने कहीं। कार्यक्रम का आयोजन संदर्प, इंटेक, टॉक्सिक लिंक, डब्ल्यूडब्ल्यूएफ और पीस इंस्टीट्यूट ने संयुक्त रूप से किया है। इसके अलावा अर्घ्यम, इंटरनेशनल रिवर्स, पीपल साइंस इंस्टीट्यूट भी सहयोगी हैं।

इसमें देश-विदेश के करीब 125 विशेषज्ञ हिस्सा ले रहे हैं। 27 नवंबर तक चलने वाले कार्यक्रम में नदियों के संरक्षण से जुड़े मसलों पर विस्तार से चर्चा होगी। रमेश ने कहा कि हाइड्रो प्रोजेक्ट दु:खद विकल्प हो सकता है, लेकिन हम अपने दरवाजे बंद नहीं कर सकते। इसके लिए जरूरी है कि प्रोजेक्ट शुरू होने से पहले पर्यावरण से जुड़े कानूनों को पालन किया जाए।
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