उस रात का जिक्र आते ही खेतिहर मजदूर नवाब का चेहरा बुझ-सा जाता है। लेकिन थोड़ी देर में ही उदासी झटक कर बेलौस कहते हैं, कोई बात नहीं, भगवान सब भला करेगा।
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खेतों में काम करने वाले मजदूर नवाब का राजनीति से कुछ लेना देना नहीं है। गांव में बरसों से मुसलिम और राजपूत परिवार साथ साथ रहते आए हैं। मसजिद के पास स्थित मुसलिम परिवारों की बस्ती में रहने वाले नवाब के शब्दों में नफासत नहीं मिली-जुली गंगा-जमुनी तहजीब का खांटीपन बहता है।
वे मसजिद जाते हैं नमाज पढ़ते हैं मगर बातचीत में अल्लाह या भगवान का फर्क नहीं जानते। भले ही गांव में करीब सप्ताह भर पहले हुए हादसे के जख्म हरे दिखते हैं लेकिन नवाब जैसे ग्रामीणों का हौसला उम्मीद भी देता है।
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सूनी गलियों का सन्नाटा
बुधवार की सुबह भी गांव और पुलिस वालों के लिए रोज जैसी थी। राणा प्रताप की मूर्ति वाले विशाल गेट के पास चैनलों की ओबी वैन और पुलिस का भारी बंदोबस्त। गेट पर बैरिकैडिंग।
ड्यूटी संभालने के लिए बस से उतरते बीएसएफ के जवान। दादरी से एनटीपीसी टाउनशिप की तरफ जाने वाले रास्ते पर बाईं तरफ यह गांव पड़ता है। गांव में प्रवेश करें तो गलियों में सुबह के वक्त भी सन्नाटा सा पसरा दिखता है।
28 सितंबर की रात मंदिर से घोषणा के बाद भीड़ के हाथों मारे गए इकलाख के घर में अब ज्यादा लोग नहीं हैं। उनके बड़े भाई जमील के चेहरे पर सूनापन है।
अब आगे क्या होगा पता नहीं
बैठक में पुराना जंग खाया सीलिंग फैन और कड़ियों वाली छत बताती है, छोटे-मोटे काम करने वाले इकलाख ने बच्चों को पढ़ाने में कितनी जद्दोजहद की होगी।
जमील कहते हैं, माहौल खराब किया जा रहा है, कोई कह रहा है हम पाकिस्तान गए थे, क्या हम आपको आतंकी लगते हैं? हम पांच पीढ़ियों से यहां थे, अब आगे क्या होगा पता नहीं।
चार भाइयों में सबसे बड़े जमील लोनी में छोटा मोटा काम करते हैं, उनकी पत्नी कमरे में आकर पानी पूछती हैं, तो यकीन नहीं होता इसी पतली सी गली के किनारे मौजूद छोटे से घर में पूरे देश को दहला देने वाली घटना हुई होगी।
मंदिर का खामोश लाउडस्पीकर
इकलाख की गली से निकलते ही थोड़ी दूर पर सहसा मंदिर चलते चलते सामने आ जाता है। अंदर चारपाई पर पूर्व प्रधान बुजुर्ग भाग सिंह लेटे हैं। मंदिर नया बना है जिसके शिखर पर दो लाउडस्पीकर दोपहर की धूप में चमक रहे हैं।
पुजारी सुखिया अपने गांव चला गया है, बड़े मंदिर के पास छोटा मंदिर है जो पुराना है। भाग सिंह कहते हैं, हमारे पुरखे साथ रहे, हमीं ने मुसलमानों को यहां बसाया, अब हमारे लड़कों को पुलिस परेशान कर रही है। लेकिन भाग सिंह को उम्मीद है, हालात सुधरेंगे।
एक तंग सी गली जिसमें कोई चहल पहल नहीं। कहां गए सारे लोग? एक नौजवान मजहर कहता है, पता नहीं। गांव में 40-50 मुसलिम परिवार हैं जिनमें से ज्यादातर यहां रहते थे।
मजहर की आवाज में दर्द है, जब तक पुलिस है डर नहीं पर बाद में पता नहीं क्या होगा। पीछे खड़ा तहमद पहने एक शख्स कहता है, हम लोग कहां जाएंगे? हालात देखकर लोग रिश्तेदारियों में चले गए हैं।
यह अजीब है कि गांव में लोग शांत होकर अपनी बात कहते हैं भले ही वह ठाकुरों की हवेली हो या भूमिहीन खेतिहर मजदूरों का ठिकाना। लेकिन गांव के बाहर साध्वी प्राची के समर्थक उग्र हैं। हिंदू वाहिनी के लोग नाराज हैं, उन्हें गांव जाने से रोका जा रहा है। उनके तेवर और चेहरे सख्त हैं।
गांव का प्राइमरी स्कूल और खाकी वरदी में पढ़ते खेलते बच्चे। राहुल दूसरी क्लास में पढ़ता है, स्कूल फिर से खुलने से खुश है लेकिन थोड़ा उदास भी। मेरा वो दोस्त आज नहीं आया। अध्यापिका स्पष्ट करती हैं मुसलिम बच्चे स्कूल नहीं आ रहे।