-कैंपस में ही बिक रहीं निजी प्रकाशकों की महंगी किताबें और स्टेशनरी
-अभिभावकों की जेब पर पड़ रहा अतिरिक्त बोझ, शिक्षा विभाग निष्क्रिय
गुरुदत्त भारद्वाज
पुन्हाना। शिक्षा विभाग के स्पष्ट आदेशों के बावजूद पुन्हाना उपमंडल में निजी स्कूलों की मनमानी थमने का नाम नहीं ले रही है। नियमों को ताक पर रखकर निजी स्कूल संचालक खुलेआम स्कूल परिसर में ही किताबें, स्टेशनरी और वर्दी बेच रहे हैं और अभिभावकों को इन्हें वहीं से खरीदने के लिए बाध्य कर रहे हैं। इस पूरे मामले में शिक्षा विभाग की निष्क्रियता भी सवालों के घेरे में है।
अभिभावकों का आरोप है कि निजी स्कूल हर वर्ष मनमाने प्रकाशनों की किताबें लागू कर देते हैं, जिससे पहले से खरीदी गई किताबें बेकार हो जाती हैं। एक छात्र की किताबों पर चार से पांच हजार रुपये तक का खर्च आता है, जो ग्रामीण और मध्यम वर्गीय परिवारों के लिए भारी आर्थिक बोझ बनता जा रहा है। यदि किताबें हर साल न बदली जाएं तो वही किताबें अन्य बच्चों के भी काम आ सकती हैं, लेकिन स्कूल संचालकों की इस नीति से अभिभावकों को हर बार नई किताबें खरीदने के लिए मजबूर होना पड़ता है।
ग्रामीण क्षेत्रों में संचालित कई निजी स्कूल शिक्षा विभाग के नियमों की खुलेआम अनदेखी कर रहे हैं। विभाग द्वारा स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं कि स्कूल किसी विशेष दुकान या प्रकाशन से किताबें खरीदने के लिए अभिभावकों को बाध्य नहीं कर सकते, लेकिन हकीकत इससे उलट है। स्कूलों द्वारा बनाए गए व्हाट्सएप ग्रुप में अभिभावकों को संदेश भेजकर कहा जाता है कि किताबें और वर्दी स्कूल में ही उपलब्ध हैं और उन्हें वहीं से खरीदना अनिवार्य है। खुलेआम चल रहे इस खेल पर न तो शिक्षा विभाग गंभीर है और न ही जिला प्रशासन।
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40 रुपये वाली किताब बिक रही 500 में :
अभिभावकों का कहना है कि सामान्य बाजार में 40 से 50 रुपये की मिलने वाली किताबें स्कूलों द्वारा 400 से 500 रुपये तक में बेची जा रही हैं। इससे साफ जाहिर होता है कि स्कूल संचालकों और किताब विक्रेताओं के बीच सांठ-गांठ है। कुछ चुनिंदा दुकानों पर ही इन किताबों की उपलब्धता भी इस गठजोड़ की ओर इशारा करती है।
मनमाने प्रकाशकों से छपवाते हैं किताबें :
सूत्रों के अनुसार, स्कूल संचालक मनमाने प्रकाशनों से किताबें छपवाते हैं और उनकी कीमतें भी खुद तय कराते हैं, जिससे उन्हें भारी मुनाफा होता है। इतना ही नहीं, हर साल प्रकाशन बदलकर पुरानी किताबों को बेकार कर दिया जाता है, जिससे अभिभावकों के पास नई किताबें खरीदने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता।
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अभिभावकों में रोष :
स्थानीय लोगों का कहना है कि शिक्षा विभाग के अधिकारियों को इस पूरे मामले की जानकारी होने के बावजूद कोई ठोस कार्रवाई नहीं की जा रही है। विभाग की सुस्त कार्यप्रणाली के कारण निजी स्कूलों के हौसले बुलंद हैं और वे बेखौफ होकर अपनी मनमानी कर रहे हैं। अभिभावकों में इस स्थिति को लेकर खासा रोष है। उनका कहना है कि शिक्षा के नाम पर खुलेआम लूट हो रही है और जिम्मेदार विभाग आंखें मूंदे बैठा है। उन्होंने जिला प्रशासन से मांग की है कि ऐसे स्कूलों की नियमित जांच कर दोषी संचालकों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए, ताकि आम लोगों को इस आर्थिक शोषण से राहत मिल सके।
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विभाग की ओर से स्पष्ट निर्देश जारी किए गए हैं कि कोई भी निजी स्कूल अभिभावकों को किसी विशेष दुकान या स्कूल परिसर से किताबें व वर्दी खरीदने के लिए बाध्य नहीं कर सकता। यदि कहीं ऐसी शिकायत मिलती है तो जांच कर सख्त कार्रवाई की जाएगी। अभिभावकों से भी अपील की कि वे लिखित शिकायत देकर विभाग को अवगत कराएं।
- वीरेन्द्र कुमार, खंड शिक्षा अधिकारी पुन्हाना।