- युवक को 2008 में अलॉट हुआ प्लॉट मुकदमेबाजी में लंबित होने पर प्राधिकरण ने दिया था दूसरा प्लॉट
- पहले वाले प्लॉट को ही लेने के लिए डाली थी याचिका
संवाद न्यूज एजेंसी
गुरुग्राम। निचली अदालत में दूसरा प्लॉट देने के खिलाफ डाली गई याचिका पर याचिकाकर्ता को दिए गए 10 लाख रुपये के आदेश को ऊपरी अदालत ने पलटते हुए खारिज कर दिया है। यह आदेश अतिरिक्त सत्र एवं न्यायाधीश जगदीप सिंह की अदालत ने दिया है। याचिकाकर्ता द्वारा खरीदे गए प्लॉट पर हाईकोर्ट में मुकदमेबाजी होने पर दूसरा प्लॉट दिया था। पहले वाले ही प्लॉट की मांग को लेकर उन्होंने अदालत में याचिका दायर की थी।
हरियाणा शहरी विकास प्राधिकरण (एचएसवीपी) ने 2008 में सेक्टर-52 में एक प्लॉट के लिए विकास अत्री को रि-अलॉटमेंट का पत्र जारी किया गया। 2011 में उनके नाम से लेटर ऑफ पजेशन दे दिया गया। कुछ समय बाद वह प्लॉट हाईकोर्ट में एक मामले में चला गया। ऐसे में हरियाणा शहरी विकास प्राधिकरण (एचएसवीपी) ने उन्हें दूसरा प्लॉट आवंटित कर दिया। कुछ समय बाद वह प्लॉट मुकदमेबाजी से बाहर हो गया। इसके बाद प्राधिकरण ने वह प्लॉट किसी और को अलॉट कर दिया।
इस पर उन्होंने अदालत में याचिका दायर करते हुए वह ही प्लॉट उन्हें देने की मांग की। उनका कहना था कि वह प्लॉट दूसरे प्लॉट के मुकाबले में काफी बेहतर लोकेशन पर था। निचली अदालत ने उनकी याचिका खारिज करते हुए प्राधिकरण को आदेश दिया था कि वह याचिकाकर्ता को 10 लाख रुपये का मुआवजा दें।
इस पर प्राधिकरण की तरफ से आदेश को चुनौती देते हुए ऊपरी अदालत में याचिका दायर की। अदालत ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद निचली अदालत के 10 लाख रुपये के मुआवजा देने के आदेश को खारिज कर दिया।