बिछोर गांव के प्रमुख लोगों ने लिया फैसला, हिंदू-मुस्लिम भाईचारे की मिसाल कायम की
यूनुस अल्वी
पुन्हाना। बिछोर गांव में मोहर्रम के मौके पर हर वर्ष निकाले जाने वाले ताजिए अब शनिवार को नहीं निकाले जाएंगे। यह फैसला गांव के प्रमुख लोगों ने गांव बिछोर व उसके आसपास के गांवों से गुजरने वाली 84 कोस परिक्रमा को लेकर लिया है। लोगों ने इस फैसले से हिंदू-मुस्लिम भाईचारे की मिसाल कायम की है, जिसका जिला प्रशासन और इलाके के हिंदू व मुस्लिम समाज के लोगों ने स्वागत किया है।
गांव बिछोर में हर साल निकाले जाने वाले ताजिए शनिवार को दिन के समय निकाले जाने थे। बता दें कि मेवात में करीब 40-50 साल पहले तक पुन्हाना, बिछोर, नगीना, शाह चोखा, टांई, नूंह, साकरस सहित 70 से अधिक गांवों में मोहर्रम के मौके पर ताजिए निकाले जाते थे, जो अब केवल बिछौर गांव तक ही सिमट कर रह गए हैं। गांव बिछौर में ताजिए निकालने और न निकालने को लेकर कई बार गांव के प्रमुख लोगों में आपस में संघर्ष हो चुका है। कई बार झगड़ा भी हो चुका है। गौरतलब है कि मोहर्रम के अवसर पर मेवात जिले में निकाले जाने वाले ताजियों के अवसर आयोजित मेलों की संख्या घटने का मुख्य कारण मेला देखने आने वाली महिलाओं के साथ छेड़छाड़ और शराब पीकर युवाओं का हुड़दंग करना है। वहीं नूंह जिले में 98 फीसदी से अधिक लोगों के तब्लीग जमात से जुड़ाव रखना भी एक बड़ा कारण है, जो ताजिए निकालने को बड़ा गुनाह बताते हैं।
बता दें कि इस्लाम धर्म के संस्थापक हजरत मुहम्मद साहब के नवासे इमाम हसन की शहादत के मौके पर उनकी याद में मुस्लिम समाज का एक तबका हर साल ताजिए निकालता है। ताजिए निकालने के मौके पर लगने वाले मेलों में आसपास के गांवों के बच्चे, युवा, बुजुर्ग और महिलाएं ताजिया देखने जाते थे। इस मौके पर लोगों द्वारा तलवारबाजी व पट्टेबाजी का हुनर दिखाया जाता था। जहां इमाम हुसैन की शहादत के मौके पर गमगीन गाने जिसे मरसिया कहते हैं गाते थे, वहीं महिलाएं इमाम हुसैन की शहादत के गम में अपनी छाती पीटकर हब्दा देती थीं, लेकिन कुछ धार्मिक लोगों द्वारा इसे इस्लाम के खिलाफ बताने और कुछ हुड़दंगियों द्वारा मेले में महिलाओं के साथ छेड़छाड़ करने, मलिाओं के जेवर की छीना झपटी करने जैसी बातें सामने आने लगीं, जिसकी वजह से लोगों ने इन मेलों में आना-जाना कम कर दिया। आखिरकार मोहर्रम के अवसर पर निकलने वाले ताजियों की संख्या आए दिन सिमटने लगी। अब ये नूंह जिला के केवल बिछोर में ही निकाले जाते हैं।
जमीयत उलेमा हिंद के हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, चंदीगढ़ और पंजाब प्रांत के महासचिव मौलाना याहया करीमी का कहना है कि इस्लाम धर्म में ऐसे मेले निकालने नाजायज हैं। इनका सवाब मिलने की बजाय गुनाह होता है। इस्लाम धर्म में गम के माहौल में छाती पीटना या उनके लिए मरसिया पढ़ना सब हराम है।
फोटो-फाईल, बिछौर गांव में पिछले साल निकाले गए ताजिए
फोटो फाईल ताजियों के मौके पर पट्टेबाजी का कला दिखाते हुए