बीते दो दशक में तथाकथित विकास और अवैध खनन के कारण अरावली की पहाड़ियां समतल हो चुकी हैं। अब यह भारत के पश्चिम और पाकिस्तान की ओर से आने वाली धूल भरी हवाओं को रोकने में नाकाम साबित हो रही हैं। इससे राजस्थान और हरियाणा का बड़ा हिस्सा मरुस्थल की चपेट में आ गया है। हाल ही में जारी भारतीय अंतरिक्ष और अनुसंधान संगठन की रिपोर्ट में इसकी पुष्टि हुई है।
संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन में गूंजा था मामला
जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क के अंतर्गत शीर्ष निकाय कांफ्रेंस ऑफ पार्टीज (कॉप) के 24वें सत्र में भी यह मामला गूंजा था। तेजी से बढ़ रहे मरुस्थल से निपटने के लिए सितंबर 2018 में आयोजित इस सम्मेलन में बंजर भूमि को पुनर्जीवित करने पर चर्चा हुई थी। भारत सरकार की यह परियोजना मरुस्थलीकरण से निपटने के लिए आयोजित हुए इसी संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन के कॉप 24 के एजेंडे का एक हिस्सा है। इस परियोजना के अंतर्गत वर्ष 2030 तक करीब 26 मिलियन हेक्टेयर बंजर भूमि को पुनर्जीवित करने का लक्ष्य है।
अफ्रीकी महाद्वीप में बन रही द ग्रेट ग्रीन वॉल से प्रेरित है
इस परियोजना की प्रेरणा भारत सरकार को अफ्रीका में बन रही दा ग्रेट ग्रीन वॉल से मिली है। इसे सहारा रेगिस्तान के अफ्रीकी महाद्वीप के दक्षिणी भाग में हो रहे विस्तार को रोकने के लिए तैैयार किया जा रहा है। पेड़ों की यह कतार पश्चिम में स्थित देश सेनेगल से लेकर पूर्व में स्थित हॉर्न ऑफ अफ्रीकी देश जिबूती तक होगी। इसकी कुल लंबाई 6,164 किमी है। इस परियोजना की शुरुआत अफ्रीकन संघ द्वारा वर्ष 2007 में की गई थी। वर्तमान में इस परियोजना का 17 फीसदी कार्य पूरा हो गया है।
क्या होंगे हरित दीवार से लाभ:
- रेगिस्तान के विस्तार पर लगेगी रोक।
- मरुस्थलीय क्षेत्र में कमी आएगी।
- भू जलस्तर में होगी बढ़ोतरी।
- तेजी से गर्म हो रहे दिल्ली-एनसीआर को मिलेगी राहत।
- खेती योग्य भूमि में होगी वृद्धि
हरित दीवार के निर्माण से बढ़ रही बंजर भूमि में कमी आएगी। इससे प्रदेश में वन्यजीव और पौधों की लुप्त हो रही प्रजातियों को बचाने में मदद मिलेगी। इसके अलावा औद्योगिक नगरी कहे जाने वाले शहर गुरुग्राम, मानेसर, भिवाड़ी और फरीदाबाद के लिए यह संजीवनी साबित होगी। - विवेक कांबोज, पर्यावरणविद्