डेंगू के चलते गिलोए, पपीते के पत्ते, एलोवेरा और बकरी के दूध की मांग व दाम भले ही बढ़ गए हों, मगर एम्स के डॉक्टरों का कहना है कि इस बात के कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं हैं कि इन चीजों से डेंगू से लड़ने में मदद मिलती है। डॉक्टरों ने लोगों को इनके चक्कर में नहीं पड़ने का सुझाव दिया है।
भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के चिकित्सकों का स्पष्ट कहना है कि अभी तक इस पर अध्ययन नहीं किया गया है। यही वजह है कि कोई भी डॉक्टर डेंगू के मरीज को इसका सेवन करने की सलाह नहीं देता। एम्स चिकित्सकों का कहना है कि आयुष मंत्रालय को इस पर अध्ययन कराना चाहिए।
एम्स में बुधवार को आयोजित प्रेस वार्ता में मेडिसिन, माइक्रोबायोलॉजी, कम्युनिटी मेडिसिन और वायरोलॉजी विभाग के वरिष्ठ चिकित्सकों ने एक सुर में कहा कि बकरी के दूध और पपीते के पत्ते के जूस से डेंगू मरीजों कोई लाभ नहीं मिलता है।
इससे डेंगू मरीजों को लाभ मिलता है यह पूरी तरह से मिथक है
हालांकि चिकित्सकों ने यह भी कहा कि संभव है किसी मरीज को इसके सेवन से लाभ मिला हो, लेकिन इस आधार पर सभी मरीजों को इसके सेवन की सलाह नहीं दी जा सकती है, क्योंकि इसका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है।
एम्स मेडिसिन विभाग के प्रमुख डॉ. एस.के. शर्मा ने कहा कि डेंगू के मरीजों को तरल पदार्थों के सेवन से फायदा मिलता है। इस बीमारी का सबसे बेहतर इलाज तरल पदार्थ ही है।
यदि मरीज पी सकता है तो अच्छी बात है और अगर उल्टी हो रही है तो डॉक्टरी तरीकों से उसके शरीर में तरल पहुंचाया जा सकता है। मेडिसिन विभाग के प्रोफेसर डॉ. आशुतोष विश्वास ने कहा कि बकरी का दूध और पपीते के पत्ते के जूस से डेंगू मरीजों को लाभ मिलता है यह पूरी तरह से मिथक है।
प्लेटलेट्स के लिए मारामारी ठीक नहीं
एम्स के चिकित्सकों का कहना है कि डेंगू की वजह से .1 से .3 फीसदी मौत की संभावना होती है। डेंगू के नाम पर प्लेटलेट्स का धंधा ठीक नहीं है।
जरूरी नहीं कि प्लेटलेट्स कम हुए हैं तो चढ़ाना पड़े। डॉ. शर्मा ने बताया कि एम्स में डेंगू पीड़ित कुछ ऐसे भी मरीज इलाज के लिए आए हैं, जिनका प्लेटलेट्स पांच से छह हजार के बीच था और उन्हें बिना प्लेटलेट्स चढ़ाए ही ठीक किया गया।
दरअसल, शरीर के किसी अंग से रक्त स्राव होने अथवा रक्त चाप कम होने की वजह से शरीर के दूसरे अंगों पर असर पड़ रहा हो तब ही प्लेटलेट्स चढ़ाने की आवश्यकता होती है। इसके लिए एक निरंतर अंतराल पर मरीज के खून व शरीर के दूसरे पैरामीटर की जांच करनी पड़ती है।
ऐसे भी हो सकता है इलाज
चिकित्सकों का कहना है कि जब किसी को बुखार आता है और जांच में डेंगू की पुष्टि होती है तो उस मरीज को कम से कम पांच दिन घर पर ही आराम करना चाहिए और मरीज को मच्छरदानी में ही रखना चाहिए।
क्योंकि डेंगू के मरीज को अगर साधारण मच्छर काट ले तो वो भी डेंगू वाला मच्छर बन जाता है। डेंगू का वायरस वैसे लोगों पर ज्यादा हमला करता है जिनकी उम्र कम हो या 50 वर्ष से ऊपर हो।
बच्चों और बुजुर्गों में रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है। डेंगू मरीजों के शरीर में पानी की कमी होने पर सबसे पहले मरीज के लिवर पर असर पड़ता है और इसके बाद धीरे-धीरे शरीर के दूसरे अंगों पर असर पड़ना शुरू हो जाता है।