यह कहना है 1971 के युद्ध में लड़े गाजियाबाद के वीर चक्र विजेता कर्नल तेजेंद्र पाल त्यागी का। राष्ट्रीय सेना दिवस के अवसर पर उन्होंने कहा कि वर्ष 1971 भारत-पाकिस्तान के युद्ध के दौरान स्थितियां बेहद दूसरी थीं। उस समय हथियारों से आमने-सामने की लड़ाई होती थी। लेकिन अब समय बदल रहा है। आए दिन नए-नए तकनीक आने से युद्ध के स्वरूप में भी बदलाव स्वभाविक है। अब युद्ध स्पेस, साइबर और हथियार तीनों के दम पर लड़ी जाएगी। ऐसे में देश की सेना भी तेजी से दुनिया के कदम से कदम मिलाकर चल रही है।
1999 के युद्ध में देश के लिए खाईं 17 गोलियां
ऐसे हीं गाजियाबाद के योद्धा कैप्टन महेंद्र सिंह रावत ने बताया कि वर्ष 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान उन्होंने दुश्मनों का सामना करते हुए 17 गोलियां खाईं। उन्होंने बताया कि 1999 में युद्ध के दौरान हमले में घायल होने के बाद उन्होंने पांच माह से अधिक समय अस्पताल में बीताया। इसके बाद राष्ट्रपति की ओर से उनको सम्मानित किया गया।
उन्होंने बताया कि बदलते दौर के अनुसार सेना अपने तौर-तरीकों, तकनीक और प्रक्रियाओं को लगातार अपडेट कर रही है। उद्देश्य यही है कि दुश्मन से हमेशा चार कदम आगे रहा जाए। शांतिकाल हो, युद्ध जैसी स्थिति हो या पूर्ण युद्ध, हर हाल में सेना को विजयी बनाकर लौटना है। इसके लिए प्रशिक्षण और तैयारी में कोई कमी नहीं छोड़ी जा रही है।