मस्जिदों के इतिहास में मसूरी कस्बे में दो ऐतिहासिक मस्जिदें हैं, जिनमें आज आपको रूबरू करा रहे हैं मसूरी की मक्का मस्जिद से। यह मस्जिद करीब पौने दो सौ साल पहले बनाई गई थी।
100 साल से ज्यादा उम्र के हाजी माशूक अली बुजुर्गों से सुनी यादों को ताजा कर बताते हैं कि सन् 1740 में ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा गंगनहर का निर्माण कराया गया था। तब नहर के रास्ते पर आ रहे मसूरी गांव को वहां से हटाकर वर्तमान स्थान पर बसाया गया था।
गांव की स्थापना के करीब 100 साल बाद सन् 1838 में गांववालों ने ही मक्का मस्जिद का निर्माण कराया था। यह इलाके की पहली मस्जिद थी, जो 150 वर्ग गज में बनी थी। इससे पहले यहां कोई मस्जिद नहीं थी। उस वक्त गांव की आबादी महज 500 थी और नमाजी थे सिर्फ डेढ़ सौ। नहर के पास होने के बावजूद वुजू करने और पीने के पानी के लिए एक कुआं बनाया गया था। तब भी लोग पानी को संरक्षित करने के लिए बड़ी जद्दोजहद कर रहे थे।
वुजू में हाथ-मुंह धोने के लिए के इस्तेमाल किए गए पानी को एक हौज में संरक्षित किया जाता था। फिर इस पानी को पशुओं को नहलाने में इस्तेमाल किया जाता था। वक्त के साथ-साथ लोगों की तादाद बढ़ी, सैकड़ों से हजारों हुए। मस्जिद के सौंदर्यीकरण की तरफ लोगों का रुझान हुआ, जिसका नतीजा यह निकला कि इस मस्जिद को दोबारा से तामीर कराने का फैसला लिया गया। मस्जिद केइमाम कारी मोहम्मद आसिफ बताते हैं कि वर्ष 2003 में मस्जिद को शहीद कर दोबारा बनवाया गया।
यह मस्जिद गांव के बीचों बीच है। सैकड़ों लोग यहां नमाज अदा करते हैं। जुमे की नमाज में नमाजियों की तादाद काफी बढ़ जाती है। आसपास के इलाके से भी लोग यहां नमाज अदा करने आते हैं।