अंधाधुंध जल दोहन ने गाजियाबाद में धरती की कोख को जैसे सुखा दिया है। हालत यह है कि साल-दर-साल ग्राउंड वाटर का लेवल लगातार गिरता ही जा रहा है। ऐसे में गाजियाबाद लगातार खतरे की ओर बढ़ रहा है। पर्यावरणविद् इस हालात पर लगातार टेंशन में थे।
एनजीटी के इस आदेश से शायद गाजियाबाद धरती को राहत मिलने की उम्मीद है।एक्टिविस्ट आकाश वशिष्ठ ने बताया कि तेजी से हो रहे जल दोहन से गाजियाबाद शहर का ग्राउंड वाटर खत्म हो चुका है। हजारों लीटर गैलन पानी के प्रतिदिन दोहन से गाजियाबाद सिस्मिक जोन-4 में आ चुका है।
निगम क्षेत्र को पहले से ही ओवर एक्सपोलिट कैटेगरी (अधिसूचित क्षेत्र) में डाला हुआ है। इसके बाद भी धड़ल्ले से निगम सीमा में ही बोरवैल व समर सिबल से जल दोहन किया जा रहा है। जहां पर निगम की वाटर सप्लाई है, वहां समर सिबल लगाना प्रतिबंधित है। इसके बाद भी कई लाख गैलन पानी का दोहन होता है।
यहां तो हालात ऐसे हैं कि घर-घर में सबमर्सिबल लगे हुए हैं। जबकि वॉटर हार्वेस्टिंग सिस्टम चंद ही लोगों ने लगवा रखे हैं। ऐसे में धरती की कोख से पानी तो खींचा जा रहा है, मगर उसे वापस नहीं दिया जा रहा। इसी से प्रकृति का चक्र बिगड़ने लगा है।
एक्टीविस्ट सुशील राघव ने बताया कि ओवर एक्सपोलिट कैटेगरी के हिसाब से गाजियाबाद के ग्राउंड वाटर को पांच ब्लॉक में बांटा गया है। इनमें भोजपुर, रजापुर, लोनी और नगर निगम क्षेत्र की स्थिति बदत्तर हो चुकी है। जबकि अगर यही हालात रहे तो मुरादनगर की स्थिति जल्द ही खराब हो सकती है।
प्राधिकरण संरक्षण अधिनियम के तहत गाजियाबाद में बोरवेल नहीं किया जा सकता।पर्यावरणविद् मनोज मिश्रा का कहना है कि एनजीटी का यह आदेश एनसीआर के तेजी से गिरते ग्राउंड वॉटर को रोकने का ब्रह्मास्त्र साबित हो सकता है। अब बारी अफसरों की है। अधिकारियों को चाहिए कि एनजीटी के इस आदेश का निष्पक्ष और तेजी के साथ लागू कराएं।