रक्तदान कर अंजान से बना रहे खून का रिश्ता
गाजियाबाद। इलाज की सुविधा होने के बाद भी कई बार लोगों के जीवन की डोर सिर्फ इसलिए टूट जाती है कि उन्हें समय पर खून नहीं मिलता। आज भी लोग गलत धारणाओं के कारण रक्तदान करने में हिचकते हैं, जबकि रक्तदान करने से रक्तदाता को कई गंभीर बीमारियों से बचाव होता है। धार्मिक दृष्टिकोण से भी कई तरह की मान्यताएं पूरी होती हैं।
वहीं कई लोग ऐसे हैं जो हर तीन महीने के बाद रक्तदान करना अपने जीवन का हिस्सा मान चुके हैं। एक अक्तूबर को स्वैच्छिक रक्तदान दिवस के रूप में इसलिए मनाया जाता है कि अधिक से अधिक लोग रक्तदान के लिए आगे आएं और रक्तदान कर स्वयं स्वस्थ रहें और दूसरों का जीवन बचाएं। एमएमजी में एक और दो अक्तूबर को रक्तदान शिविर का आयोजन किया जा रहा है।
डॉ. अरविंद इलाज के साथ करते हैं खून दान
वरिष्ठ फिजिशियन डॉ. अरविंद डोगरा गरीब मरीजों का निशुल्क इलाज करने के साथ ही रक्तदान भी करते हैं। अब तक वह 110 बार रक्तदान कर समाज और डाक्टरी पेशे के लिए एक नजीर बन चुके हैं। डॉक्टर डोगरा का कहना है कि जो लोग स्वस्थ हैं, उन्हें रक्तदान के लिए आगे आना चाहिए, क्योंकि रक्तदान करने से कई बीमारियों का इलाज बिना दवाई के हो जाता है। रक्तदान करने से शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। उन्होंने अपना नाम ऑनलाइन खून दान करने वालों में दर्ज कराया है। कई बार नेट पर उनका नाम सर्च कर उन्हें खून देने के लिए बुलाते हैं। क्रिकेट के खिलाड़ी डॉ. डोगरा 1993 में दोस्तों के साथ क्रिकेट खेलकर घर वापस आए थे। उस पल को याद करते हुए बताया कि टीवी पर सूचना चल रही थी कि दिल्ली के स्कॉर्ट अस्पताल में किसी मरीज को खून की आवश्यकता है। उन्होंने इसे सुना व बिना कुछ खाए पिए घर से निकल पड़े। खून देने के बाद शाम को वापस लौटे। उनका उस मरीज के साथ कोई रिश्ता नहीं था, लेकिन पता था कि उनके खून देने से उसकी जान बच सकती है। डॉ. एक अस्पताल में क्रिटिकल केयर यूनिट के प्रभारी थे। उस दौरान कई बार हादसे या गन शॉट में घायल होने पर अधिक रक्तस्राव से गंभीर हुए लोगों को खून देकर उनकी जिंदगी बचाई।
सड़क हादसे में घायल को तड़पते देखा तो शुरू किया रक्तदान
आवास विकास परिषद में अभियंता एमबी कौशिक 73 बार रक्तदान कर चुके हैं। उन्होंने बताया कि 1981 में दिल्ली में थे। एक दिन उन्होंने देखा कि सड़क हादसे में एक व्यक्ति गंभीर रूप से घायल हो गया है। उसे अस्पताल पहुंचाया गया तो डॉक्टरों ने बताया कि घायल को खून की सख्त जरूरत है, लेकिन कोई भी खून देने के लिए तैयार नहीं हुआ। मैंने इस समस्या से जूझते एक अंजान को देखा तो उसके लिए रक्तदान किया। उसके बाद वह कभी-कभी रक्तदान करते रहते थे। इसके बाद सन 2002 में भी ऐसा ही एक हादसा हुआ। उसमें भी घायल को खून की जरूरत थी। उस घायल को खून देने के बाद कुछ सार्थक करने का विचार बनाया। तब से हर तीन महीने पर रक्तदान करता हूं। एमबी कौशिक ने बताया कि अब बेटे और बहू भी रक्तदान करने के लिए हर समय आगे रहते हैं। एमबी कौशिक का कहना है कि जीवन का बस एक उद्देश्य है कि जब तक जीवित रहें, किसी की खून की कमी से मौत न होने पाए, इसलिए दूसरों को भी रक्तदान के लिए प्रेरित करते हैं।
डॉक्टर के पिता को आर्मी अस्पताल में दिय खून तो शुरू हो गया सिलसिला
दुहाई निवासी अमित त्यागी अब तक 38 बार रक्तदान कर चुके हैं। उन्होंने बताया कि दस साल पहले एक परिचित डॉक्टर के पिता को तबीयत खराब थी, उन्हें दिल्ली के आर्मी अस्पताल में भर्ती कराया गया था। डॉक्टरों ने उनके लिए चार यूनिट खून की मांगा था। उन्हें खून देने के लिए पहली बार आर्मी अस्पताल में गया था। इसके बाद लगा कि खून दान करने से कोई नुकसान नहीं हुआ है, बल्कि नई ताजगी का एहसास हो रहा है। इससे लगातार जारी रखना चाहिए। तीन साल तक अकेले रक्तदान कर रहा था, लेकिन दोस्तों ने कहा अकेले खून दोगे तो एक इंसान का जीवन बचाओ, हम सब तुम्हारे साथ हैं, शिविर लगाओ। पिछले छह साल से लगातार शिविर लगा रहा हूं, एक शिविर में 50 से 60 यूनिट रक्त एकत्र करता हूं।