जब घर में रेडियो को छूना मना था...
गाजियाबाद। रेडियो एक लंबा सफर तय कर चुका है। कई पीढ़ियां इसको सुनकर बढ़ी हुई हैं। हर किसी के पास सुनाने को अपने-अपने किस्से हैं। शुरूआत में रेडियो किसी अजूबे से कम नहीं था। कभी इसका होना स्टेट्स की बात हुआ करती थी। सूचना देने से लेकर मनोरंजन करने की जिम्मेदारी दशकों तक इसने निभाई। एक दौर वह भी था जब फिलिप्स की रेडियो शादी के दहेज का आकर्षण था। नया रेडियो घर में आया तो सबको छूने की इजाजत नहीं थी। रेडियो से जुड़ी कुछ दिलचस्प बातें श्रोताओं ने साझा की।
रेडियो के बारे में
23 जुलाई 1927 में बॉम्बे स्टेशन से पहला रेडियो प्रसारण किया गया था। उस वक्त रेडियो स्टेशन का स्वामित्व एक निजी कंपनी के हाथ में था। एक अप्रैल 1930 को सरकार ने प्रसारण अपने नियंत्रण में ले लिया और इसका नाम इंडियन स्टेट ब्रॉडकास्टिंग सर्विस कर दिया। इसके बाद आठ जून 1936 को इसका नाम बदल कर ऑल इंडिया रेडियो कर दिया गया।
आठ वर्ष की उम्र में हमारे घर आया था रेडियो
हमारे घर में सबसे पहला रेडियो 1945 में आया। उस जमाने में हर घर में रेडियो नहीं हुआ करते थे। उस वक्त मैं आठ साल का था। मेरा जन्म 1937 में श्रीनगर में हुआ था। बंटवारे के बाद हमलोग पहले मथुरा आए उसके बाद 1965 में गाजियाबाद आए। उस समय भी हम अपना रेडियो लेकर आए थे। जब घर में नया रेडियो आया था तो हमें छूने की मनाही होती थी और हम छुप-छुप कर गाने सुनते थे जिसके लिए काफी डांट पड़ती थी। पापा कहते थे कि नॉब घूमा-घूमा कर इसे तोड़ दोगे। जब हमारे घर में रेडियो बजता था तो लोग अपने घरों से खिड़कियों से कान लगा कर सुनते थे खासकर कोई समाचार जब प्रसारित होता था।
जेएल रैना, समाजशास्त्री, 84 वर्ष
हाईस्कूल पास करने पर मिला था अपना रेडियो
गाजियाबाद में रेडियो की सबसे पुरानी दुकान घंटाघर के सामने जैन मंदिर के पास चक्रवर्ती रेडियो की दुकान हुआ करती थी। रेडियो खरीदने के लिए लोग वहीं जाते थे। उसके बाद कई और दुकानें भी खुलीं लेकिन वही सबसे पुरानी दुकान थी। मैंने जब से होश संभाला तब से मैंने अपने घर में रेडियो देखा। हमारे घर पर टेबल टॉप मॉडल हुआ करता था। पिताजी न्यूज सुना करते थे, लेकिन बचपन में हम गाने सुनना पसंद करते थे। हाईस्कूल पास करने के बाद मुझे अपना एक नया ट्रांजिस्टर मिला था, जिस पर बीबीसी समाचार, बिनाका गीता माला, रेडियो सीलोन सुना करते थे। इन कार्यक्रमों की प्रसिद्धि इतनी बढ़ गई थी कि इसको सुनने के लिए लोग रेडियो खरीदा करते थे।
सुदीप साहू , रेडियो श्रोता संघ के सचिव
अब तक 200 रेडियो खरीदे
मेरे जन्म के पहले से मेरे घर में रेडियो था। लेकिन मुझे 12-13 साल की उम्र से रेडियो का ऐसा नशा चढ़ा कि मैं रेडियो खरीदने लगा। सबसे पहले 12 साल की उम्र में रेडियो खरीदा था। उसके बाद जो भी डिजाइन या नया मॉडल आता था मैं खरीद लेता था। दिल्ली के लाजपत मार्केट में हमारी कपड़े की दुकान है। हम कभी लाजपत मार्केट से तो कभी बजरिया से ट्रांजिस्टर, रेडियो आदि खरीदते थे। हमने अभी तक में 200 के लगभग रेडियो खरीदे होंगे। अब तो इनमें से पांच छह रेडियो अभी भी मेरे पास रखे हैं। उस वक्त कच्चे मकान होते थे और गर्मी में छतों पर सोते हुए यह रेडियो ही हमारे मनोरंजन और ज्ञान का साधन हुआ करते थे। गीतमाला, आपकी अदालत आदि कार्यक्रम सुनते थे।
- मनोहर लाल गांधी, रेडियो श्रोता संघ के अध्यक्ष
छिपकर सुनते थे खबर
हमारे घर में आजादी से पहले अंग्रेजों के शासन काल से रेडियो था। पिताजी बताते थे कि उस समय छिपकर खबरें सुनी जाती थीं। लोग देश में क्या चल रहा है इसकी खबर सुनने घर आते थे और धीमी-धीमी आवाज में खबरें सुनते थे। हमने जब होश संभाला तो हमें तो गाने सुनने का शौक चढ़ा लेकिन इसके लिए काफी डांट पड़ती थी। पापा जब भी कहीं बाहर निकलते थे तो मैं चोरी छुपे गाने सुनने लगता था, लेकिन जब पापा को पता चलती थी तो खूब डांट पड़ती थी। वह कहते थे कि पढ़ाई में ध्यान लगाओ गाने कम सुनो।
विनोद भार्गव, वरिष्ठ नागरिक