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ऑकसीजन जुटाने में सांसें फूलीं, कई ने तोड़ा दम

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ऑक्सीजन जुटाने में सांसे फूलीं, कई ने तोड़ा दम
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गाजियाबाद। कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर के दौरान लोगों को अपनों को बचाने के लिए ऑक्सीजन के लिए जंग सी लड़नी पड़ी। ऑक्सीजन जुटाने में सांसें फूल गई। तीमारदार घंटों ऑक्सीजन लेने के लिए सिलेंडर लेकर लाइन में खड़े रहे। ऑक्सीजन के लिए आसपास के जिलों तक दौड़ लगाई। ऑक्सीजन की कमी से किसी ने अस्पताल तो किसी ने घर पर दम तोड़ दिया। हालात इतने खराब थे कि 15 अप्रैल से पांच मई के बीच 349 लोगों की जान गई। हालांकि मृत्यु के मामले में अधिकांश पहले किसी ने किसी बीमारी से पीड़ित थे।
शासन और कोर्ट तक पहुंची शिकायत
ऑक्सीजन की कमी से हुई मौत की गूंज शासन तक पहुंची। अस्पताल प्रबंधन पर लापरवाही का आरोप लगाते हुए कोर्ट में भी याचिका दाखिल की गई, हालांकि अभी मामला विचाराधीन है। डूडाहेड़ा के रहने वाले कुलभूषण त्यागी ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल करते हुए आरोप लगाया था कि 28 अप्रैल को संयुक्त अस्पताल में अपने पिता को भर्ती कराने के लिए पहुंचे थे, लेकिन अस्पताल में स्टाफ ने ऑक्सीजन न होने की बात कहकर भर्ती करने से इकार कर दिया था। यह भी कहा गया था कि ऑक्सीजन सिलेंडर लाना होगा। पर्याप्त आक्सीजन न मिलने से उनकी मौत हो गई।
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गुरुग्राम से लेकर बागपत तक ऑक्सीजन लेने भाग रहे थे लोग
15 अप्रैल से अचानक संक्रमण बढ़ने के बाद हर तीसरे मरीज को ऑक्सीजन की जरूरत पड़ रही थी, लेकिन जिले जरूरत के सापेक्ष चौथाई हिस्सा भी आपूर्ति नहीं हो पा रही थी। उस समय मौजूदा स्थिति यह थी कि 150 मीट्रिक टन ऑक्सीजन की जरूरत पड़ रही थी, लेकिन आपूर्ति 35 से 40 टन ही हो पा रही थी। ऐसे में परिजन ऑक्सीजन लेने के लिए गुरुग्राम, फरीदाबाद, दिल्ली, हापुड़ व बागपत तक जा रहे थे। अस्पताल प्रबंधन तीमारदारों को बोल देते थे कि ऑक्सीजन की व्यवस्था खुद करो।
दादी को नहीं दिला पाया ऑक्सीजन
दादी को सांस की लेने में परेशानी हो रही थी। तीन मई को एमएमजी अस्पताल की इमरजेंसी में लेकर गया। वहां रैपिड जांच में कोरोना की पुष्टि हुई। सांस लेने में लगातार परेशानी बढ़ती जा रही थी, ऑक्सीजन सेचुरेशन 62 आ गया था। डॉक्टरों ने कहा कि यहां पर भर्ती की सुविधा नहीं है। इन्हें किसी आईसीयू वाले अस्पताल में ले जाओ। इसके बाद आईसीयू के लिए चार अस्पतालों के चक्कर काटे लेकिन कहीं बेड नहीं मिला। देर शाम जिला संयुक्त अस्पताल में कोविड बेड मिला। इसके बाद ऑक्सीजन की कमी के चलते नौ मई को उनकी मौत हो गई।
ह्रतिक कौशिक, मोदीनगर
न बेड मिला, न ऑक्सीजन बेटी ने घर पर तोड़ दम
अप्रैल में मेरी बेटी कोरोना की चपेट में आ गई थी। बेटी के इलाज के लिए गाजियाबाद के कई अस्पतालों में चक्कर काटने के बाद नोएडा और दिल्ली के अस्पतालों में मेरा बेटा घूमता रहा, लेकिन बेटी को ऑक्सीजन नहीं मिल पाई। जगह नहीं मिलने पर उनको घर पर ही भर्ती किया गया। 26 अप्रैल की रात ऑक्सीजन स्तर 60 से नीचे चला गया। इसके बाद उनको लेकर विभिन्न अस्पतालों के चक्कर काटे, लेकिन कहीं बेड नहीं मिल सका और तड़के मौत हो गई।
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- सरोज त्यागी, निवाड़ी
छह माह की पत्नी की हो गई मौत
मेरी शादी एक साल पहले रुबीना के साथ हुई। वह छह महीने की गर्भवती थी। इसी दौरान संक्रमण की चपेट में आ गई। इलाज के लिए कई अस्पतालों में दो दिन तक भटकते रहे, लेकिन कहीं जगह नहीं मिली। एक प्राइवेट अस्पताल में तीसरे दिन भर्ती करा पाया। तीन मई को भर्ती हुई थी। डॉक्टरों ने बताया ऑक्सीजन सिलिंडर का इंतजाम स्वयं करो तभी भर्ती करेंगे। दो दिन तक दिल्ली, हापुड़, किठौर से लाकर ऑक्सीजन देते रहे, लेकिन पांच मई को कहीं भी ऑक्सीजन सिलिंडर नहीं मिला और पत्नी ने दम तोड़ दिया।
- मोहम्मद शादाब, मसूरी
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