विनोद के परिजनों ने पुलिस पर आरोपियों को बचाने का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि आरोपियों से साठगांठ के चलते ही पुलिस ने उनकी एफआईआर दर्ज नहीं की। जब भी वह चौकी पर जाते तो सिपाही कहते कि चौकी इंचार्ज कोर्ट गए हुए हैं। चौकी इंचार्ज को फोन किया जाता तो वह खुद को लखनऊ में बताते थे। इसी तरह उन्हें हर बार अलग-अलग जवाब मिला।
पोस्टमार्टम रिपोर्ट की कॉपी भी 13 दिन बाद मिली
परिजनों का कहना है कि विनोद के आत्महत्या करने के बाद उन्हें उसका मृत्यु प्रमाणपत्र बनाना था। रिपोर्ट की कॉपी लेने के लिए भी उन्हें पुलिस के चक्कर काटने पड़े। काफी मिन्नतें करने पर घटना के 13 दिन बाद पुलिस ने उन्हें पोस्टमार्टम रिपोर्ट की कॉपी दी। इसके अलावा भी पुलिस उनसे सीधे मुंह बात नहीं करती थी। थाने या चौकी जाने पर उनके साथ अपराधियों जैसा सलूक किया जाता था।
एसपी सिटी से शिकायत के बाद एफआईआर दर्ज
ज्ञानचंद का कहना है कि उनके भतीजों व चचेरे भाइयों के साथ उनका मकान संबंधी विवाद चला आ रहा था। उक्त लोग अकसर उनके घर पर आकर गालीगलौज व झगड़ा करते थे, जिसके चलते परिवार में क्लेश चल रहा था। इसी क्लेश में विनोद ने आत्महत्या की। पुलिस द्वारा कोई कार्रवाई न करने पर परिजनों ने एसपी सिटी से गुहार लगाई। उनके आदेश से ही विजयनगर पुलिस ने सुसाइड नोट के आधार पर 15 लोगों के खिलाफ केस दर्ज किया। केस में नईम खान, अनिल, सुनील, प्रवीन, वीरेंद्र, विद्या देवी, राजरानी, राजकुमार, ममता, पिंकी, ललित, प्रेम कुमार, अनिता, राहुल और नंदलाल को नामजद किया है।