डाक टिकट दिवस पर विशेष
डाक टिकट में समेटे हुए हैं शहर और देश की विरासत
साहिबाबाद। हर इंसान के अपने-अपने शौक होते हैं। किसी को पुराने सिक्के एकत्रित करने का शौक होता है, किसी को सेलिब्रिटी के कपड़े एकत्रित करने का शौक होता है। ऐसे ही हमारे शहर में कुछ ऐसे लोग हैं, जिन्हें डाक के टिकट का संकलन करने का शौक है। हर साल डाक विभाग की तरफ से जारी किए टिकटों को इन्होंने न सिर्फ अपने पास सहेजा हुआ है बल्कि नई पीढ़ी को ये इसके बारे में जानकारी भी देते हैं। आइए जानते हैं हमारे शहर की दो ऐसी शख्सियतों को बारे में, जिन्होंने शहर से लेकर देश तक की विरासत अपने पास सहेजी हुई है।
अपने टिकटों की स्कूल-कॉलेजों में लगा चुके हैं प्रदर्शनी
डाक विभाग से रिटायर्ड निरंजन शर्मा ने 26 वर्ष की आयु से ही वह अपने इस शौक के तहत हर वर्ष विभाग की ओर से प्रकाशित नए डाक टिकट को अपने पास रखना शुरू कर दिया था। निरंजन शर्मा ने बताया कि उन्हें शुरू से ही डाक टिकट संग्रह करने का शौक रहा लेकिन वह अपने इस शौक को वर्ष 1987 से आयाम देने लगे। डाक विभाग में कार्यरत होने के चलते भी उनके लिए डाक टिकट का संग्रह करना आसान हो गया। कोई भी नया डाक टिकट जारी होता तो वह खरीदकर अपने घर की लाइब्रेरी में ले जाते। निरंजन शर्मा ने बताया कि उनके पास दस हजार डाक टिकट का बड़ा संग्रह है। इसकी जानकारी जब विभागीय अधिकारियों को मिली तो उन्हें स्कूल-कालेजों में जाकर डाक टिकट बच्चों के बीच प्रस्तुत करने और उनका महत्व बताने की जिम्मेदारी मिली। गाजियाबाद शहर की गरिमा की व्याख्या करने के लिए वर्ष 1987 में डाक विभाग द्वारा घंटाघर की मशाल ज्योति पर डाक टिकट जारी किया गया। निरंजन शर्मा का कहना है कि उस दौरान वह पोस्ट ऑफिस में कार्यरत थे। उनके प्रयासों से मशाल ज्योति का डाक टिकट के साथ ही उसे आवरण पृष्ठ पर भी प्रकाशित किया गया था। यह डाक टिकट 25 सितंबर 1987 को प्रकाशित किया गया था। उनके पास भारत के शिरोवस्त्र को पहचान दिलाने वाले डाक टिकट के साथ ही भारतीय सभी सुप्रसिद्ध संगीतकारों मसलन भीमसेन जोशी, गंगुबाई हंगल, अली अकबर खान, मल्लिकार्जुन मंसूर, विलायत खान, रवि शंकर जैसे विभूतियों पर प्रकाशित डाक टिकट हैं। देश की आजादी के चालीस वर्ष बाद डाक विभाग द्वारा तिरंगा डाक टिकट जिस पर हिंदी और उर्दू शब्द तिरंगा के रंगों में अंकित है, यह टिकट भी इनके कोष में है।
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घंटों लाइन में लगकर खरीदे देश-विदेश के डाक टिकट
शास्त्रीनगर के रहने वाले विनोद भार्गव के पास देश-विदेश के सैकड़ों डाक टिकटों का संग्रह है। जिसका उन्होंने एलबम बना रखा है। हर डाक टिकट अपनी एक कहानी, एक इतिहास और भारतीय संस्कृति को संजोए हुए होता है। भारतीय संस्कृति और इतिहास को संजोने वाले विनोद भार्गव ने बताया कि बचपन का यह शौक था जो बड़े होने पर एक जुनून बन गया। मैं सिर्फ अपने देश ही नहीं विदेशों के भी डाक टिकट संग्रह करने लगा। नौकरी में आने के बाद भी उनका जोश कम नहीं हुआ। 75 वर्षीय विनोद भार्गव ने बताया कि वह 1957 से डाक टिकटों का संग्रह कर रहे हैं। बचपन में किसी को सुना था कि वह टिकटों का संग्रह करते हैं तो मैंने भी शौक-शौक में संग्रह करना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे इन टिकटों की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्ता समझ आई तो यह शौक जुनून में बदल गया। उन्होंने बताया कि वह टिकटों के लिए कई बार घंटों लाइन में लगते थे और टिकट खरीदते थे। उनके एलबम में अपने देश की डाक टिकटों के अलावा चीन, ब्रिटेन, हॉलैंड, घाना आदि देशों के भी डाक टिकट हैं। इसके अलावा ओलंपिक गेम्स, महापुरुषों के चित्रों वाले डाक टिकट, ऐतिहासिक स्थल, महत्वपूर्ण वर्षगांठ से जुड़े टिकट से लेकर भारत सरकार द्वारा विशेष अवसरों पर जारी डाक टिकट भी उनके संग्रह में हैं। उन्होंने बताया कि नौकरी के बाद कई स्थानों पर घूमने का भी मौका मिला था तो वहां से भी डाक टिकट लाकर अपने संग्रह में लगाता था। उन्होंने कहा कि समय के साथ धीरे-धीरे डाक विभाग और डाक टिकटों की महत्ता ही समाप्त हो गई है। कुछ वर्षों बाद यह सिर्फ यादें ही बनकर रह जाएंगे।