गाजियाबाद। ग्रामीणों को घर के नजदीक बैंकिंग सेवाएं उपलब्ध कराने के उद्देश्य से शुरू की गई बीसी सखी योजना तकनीकी खामियों के कारण प्रभावित हो रही है। बैंकिंग लेनदेन के लिए बीसी सखियों को दी गई करीब 37 हजार रुपये की माइक्रो एटीएम मशीनें कई जगह एक दिन काम नहीं कर पाईं। शिकायतों के बावजूद समस्या का समाधान नहीं होने से जिले की ज्यादातर बीसी सखियों ने काम छोड़ दिया है। राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन की जिला मिशन प्रबंधक स्मिता शिवहरे के अनुसार, वर्ष 2024 में 97 बीसी सखी ने यह मशीन खरीदी थी, लेकिन समस्याओं के कारण 55 ने काम छोड़ दिया। वर्तमान में 42 बीसी सखी काम कर रही हैं। वह भी मशीन के बजाय लैपटॉप के सहारे बैंकिंग सेवाएं दे रही हैं।
रजापुर ब्लॉक की बीसी सखी शिवानी ने बताया कि उन्हें मिली माइक्रो एटीएम मशीन शुरुआत से ही काम नहीं कर रही थी। ट्रांजेक्शन करने पर कभी एरर आता तो कभी लेनदेन फेल हो जाता। कंपनी से संपर्क करने पर हर बार सर्वर डाउन होने की बात कहकर बाद में करने को कहा जाता था। कई बार कंपनी ने मशीनें जांच के लिए अपने पास रखीं, लेकिन वापस आने के बाद भी स्थिति जस की तस रही। मजबूर होकर उन्होंने मशीन छोड़कर लैपटॉप से काम शुरू कर दिया।
मुरादनगर ब्लॉक की बीसी सखी रुक्मणी ने बताया कि उन्होंने वर्ष 2023 में विकास भवन में प्रशिक्षण लिया था, जबकि मशीनें वर्ष 2024 में उपलब्ध कराई गईं। मशीन के लिए उन्होंने 37,760 रुपये खर्च किए, लेकिन एक दिन भी उसका इस्तेमाल नहीं कर पाईं। ट्रांजेक्शन के समय प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ती थी और भुगतान फेल हो जाता था। कंपनी के प्रतिनिधियों ने घर आकर मशीन चलाने की जानकारी भी दी, लेकिन समस्या दूर नहीं हुई।
नहीं बदली मशीन, भुगतान के लिए दबाव
बीसी सखी दीपांजलि ने बताया कि शुरुआत से ही मशीनों की समस्या को लेकर लगातार शिकायत की गई, लेकिन न तो मशीन बदली गई और न ही तकनीकी समस्या दूर हुई। इसके बावजूद मशीन की राशि जमा करने का दबाव बनाया जा रहा है। उनका कहना है कि जब मशीन काम ही नहीं कर रही तो भुगतान क्यों करें। बीसी सखी अर्चना त्यागी ने बताया कि पहले छोटी डिवाइस से काम बेहतर चल रहा था, लेकिन नई मशीनें आने के बाद परेशानी बढ़ गई।
कंपनी का दावा- मशीनों में खराबी नहीं
बीसी सखी को माइक्रो एटीएम मशीनें उपलब्ध कराने वाली इंटरनेशनल ट्रांसफर कंपनी के जोनल हेड सुधीर मिश्रा ने बताया कि प्रशिक्षण देने से लेकर मशीनों को चलवाने तक की जिम्मेदारी कंपनी की थी। प्रशिक्षण के बाद सभी बीसी सखियों को कोड दिए गए थे, जिन्हें तीन महीने तक इस्तेमाल नहीं करने पर एसबीआई बैंक की ओर से निष्क्रिय कर दिया गया। मशीनों में कोई तकनीकी खराबी नहीं थी। कई बार मशीनें मंगाकर जांच भी कराई गईं।
विभाग ने माना- सर्वर और कोड डिएक्टिवेशन बनी वजह
राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन की जिला मिशन प्रबंधक स्मिता शिवहरे ने बताया कि उनका टाइअप एसबीआई से था, जिसने पूरा काम इंटरनेशनल ट्रांसफर कंपनी को दिया था। उन्होंने कहा कि मशीनों के ठीक से काम नहीं करने की शिकायतें कई बार मिली थीं। कंपनी के साथ-साथ शासन और प्रशासन को भी पत्र भेजे गए। कोड डिएक्टिव होने और सर्वर डाउन रहने की समस्या भी सामने आई।
2020 में शुरू हुई थी योजना
ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाओं को रोजगार उपलब्ध कराने और गांवों में बैंकिंग सुविधाएं पहुंचाने के उद्देश्य से प्रदेश में बीसी सखी योजना की शुरुआत 22 मई 2020 को की गई थी। इसके बाद वर्ष 2021, 2022 और 2023 में प्रशिक्षण दिए गए, जबकि लेनदेन के लिए मशीनें वर्ष 2024 में उपलब्ध कराई गईं।