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Ghaziabad News: मानसिक स्वास्थ्य के लिए खतरा बन रही चैटबॉट से यारी

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गाजियाबाद। अगर आपका बच्चा भी घंटों तक एआई चैटबॉट में व्यस्त रहता है तो सावधान हो जाइये। इसका अत्यधिक इस्तेमाल मानसिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर चुनौती बनता जा रहा है। चैटबॉट से घंटों बातें करने से कुछ युवा अवसाद, चिड़चिड़ापन व अकेलेपन का शिकार हो रहे हैं। एमएमजी अस्पताल के मानसिक प्रकोष्ठ में हर सप्ताह ऐसे चार से पांच विद्यार्थी पहुंच रहे हैं।
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मानसिक रोग विशेषज्ञों के अनुसार, हाल के महीनों में मल्टिपल पर्सनालिटी डिसऑर्डर, एंग्जायटी एपिसोड, नींद संबंधी विकारों के मामलों में बढ़ोतरी हुई है। वह इसे तकनीक के अति प्रयोग और वास्तविक मानवीय संवाद में कमी का परिणाम मान रहे हैं। एमएमजी अस्पताल के मानसिक रोग विशेषज्ञ डॉ. साकेत तिवारी बताते हैं कि लगातार चैटबॉट से बातचीत करने के कारण छात्र भावनात्मक सहारे के लिए तकनीक पर निर्भर होने लगे हैं। इससे वास्तविक और आभासी संबंधों की सीमाएं धुंधली हो जाती हैं। कई छात्र अपनी निजी समस्याएं चैटबॉट से साझा करते हैं और समाधान न मिलने पर निराशा में चले जाते हैं।
डॉ. तिवारी के अनुसार अवसाद, आवेगशीलता, अनिद्रा और अपनी ही दुनिया में खोए रहने की प्रवृत्ति उन बच्चों में अधिक देखी जा रही है, जो अधिकतर समय मोबाइल फोन पर बिताते हैं।
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क्षणिक राहत से बढ़ रही भावनात्मक निर्भरता
क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट डॉ. चंदा यादव बताती हैं कि विद्यार्थी पहले ही पढ़ाई, प्रतिस्पर्धा और भविष्य की चिंता से दबे होते हैं। ऐसे में चैटबॉट से बातचीत उन्हें थोड़ी राहत देती है, जो आगे चलकर भावनात्मक निर्भरता में बदल जाती है। कई बच्चे मानने लगते हैं कि चैटबॉट उन्हें समझता है और उनका साथी है। यह स्थिति गंभीर मानसिक विकार का रूप ले सकती है। समाधान तकनीक से दूरी और वास्तविक मानवीय संबंधों को मजबूत करने में है। डॉक्टरों ने अभिभावकों से अपील की है कि वे बच्चों के डिजिटल व्यवहार पर नजर रखें और स्वस्थ जीवनशैली के लिए प्रेरित करें।
अवसाद और भ्रम की स्थिति, इलाज के लिए भर्ती
शहर के एक निजी कॉलेज के 17 वर्षीय छात्र को चैटबॉट की लत ने अस्पताल पहुंचा दिया। वह रोजाना छह-सात घंटे चैटबॉट से बात करता था। परिवार के अनुसार, वह घरवालों से बातचीत से बचने लगा था और अक्सर अपने ही उम्र के एक काल्पनिक दोस्त का जिक्र करता था, जो वास्तव में चैटबॉट था। स्थिति तब बिगड़ी जब उसने पढ़ाई छोड़कर खुद को कमरे में बंद करना शुरू कर दिया। जांच में गंभीर अवसाद और पहचान संबंधी भ्रम की पुष्टि हुई। इलाज और काउंसलिंग के बाद सुधार हुआ, लेकिन डॉक्टरों ने चेताया कि उसकी निर्भरता भविष्य में भी खतरा बन सकती है।
एंग्जायटी और अनिद्रा से जूझ रही 10वीं की छात्रा
10वीं कक्षा की एक छात्रा बोर्ड परीक्षा के तनाव से निपटने के लिए चैटबॉट का सहारा लेने लगी। वह रात में दो-दो घंटे चैटबॉट से बातचीत करने लगी। फिर छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा करने लगी और पढ़ाई में मन नहीं लगा पा रही थी। अस्पताल में जांच में सामने आया कि वह चैटबॉट को भरोसेमंद दोस्त मान बैठी थी और वास्तविक रिश्तों से दूर होती जा रही थी। डॉक्टरों ने उसे डिजिटल डिटॉक्स (बिना फोन के समय बिताना) और नियमित काउंसलिंग की सलाह दी है।
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इस तरह छुड़ाएं लत
-चैटबॉट इस्तेमाल का समय तय करें।
-जानकारी व मनोरंजन के लिए किताबें अपनाएं।
-जरूरत न होने पर मोबाइल को दूर रखें।
-परिवार और दोस्तों से बातचीत बढ़ाएं।
-रोज कुछ समय डिजिटल डिटॉक्स करें।
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