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एक बार मिली विजय फिर हर बार पराजय

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एक बार मिली विजय फिर हर बार पराजय
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गाजियाबाद। राजनीति में जिन प्रत्याशियों को जनता ने सिर माथे पर बैठाया, अगले ही विधानसभा चुनाव में उन्हें कुर्सी से उतार भी दिया। कभी विधायकों का काम काज पसंद न आने तो कभी पार्टी की लहर की वजह से जिले के मतदाताओं ने विधानसभा में अपना प्रतिनिधित्व करने वाला चेहरा बदल दिया। जिले में कई ऐसे विधायक हैं जिन्हें एक बार विजय मिली, लेकिन इसके बाद चुनाव में उतरे तो बार-बार पराजय का सामना करना पड़ा। पूर्वांचल के नेताओं की तरह पश्चिम के यह विधायक जनता के दिलों में बस न पाए।
गाजियाबाद की सदर सीट के अलावा जनता ने यह प्रयोग मुरादनगर और मोदीनगर विधानसभा क्षेत्रों में भी किया है। जिनको जनता ने सत्ता दिलाई, फिर उन्हीं विधायकों ने अगली बार चुनाव में कुर्सी गंवाई। गाजियाबाद विधानसभा सीट पर आजादी के बाद 1951 में हुए चुनाव से लेकर 1996 तक तीन विधायकों ने जीत की हैट्रिक लगाई है। सबसे पहले विधायक तेजा सिंह, फिर प्यारे लाल शर्मा और बालेश्वर त्यागी राजनीतिक हैट्रिक लगाने में सफल रहे। प्यारे लाल शर्मा के बेटे सुरेंद्र कुमार मुन्नी भी तीन बार विधायक बने, लेकिन लगातार नहीं। 2002 के विधानसभा चुनाव के बाद शहर की राजनीति में परिवर्तन आया। वर्ष 2002 में कांग्रेस के टिकट पर पहली बार विधायक बने सुरेंद्र प्रकाश गोयल ने दो साल बाद ही लोकसभा चुनाव में मैदान मार लिया और लोकसभा पहुंच गए। 2009 में वह लोकसभा चुनाव हारे तो इसके बाद कई बार विधानसभा चुनाव लड़े, लेकिन जीत नहीं पाए। वर्ष 1985 में कांग्रेस के टिकट पर सदर विधानसभा से विधायक रहे केके शर्मा फिर विधायक न बने। 2017 में वह इसी सीट पर तीसरे नंबर पर रहे थे। 2012 में गाजियाबाद विधानसभा सीट पर बसपा के टिकट से विधायक बने सुरेश बंसल भी अगले चुनाव में दूसरे नंबर पर रहे। वह 2019 में लोकसभा चुनाव भी हार गए थे। लोनी विधानसभा क्षेत्र से 2012 में विधायक रहे जाकिर अली, मुरादनगर के विधायक रहे वहाब चौधरी, मोदीनगर के विधायक रहे सुदेश शर्मा भी कार्यकाल को अगले चुनाव में रिपीट नहीं कर पाए और जनता ने उन्हें हार का सामना करना पड़ा।
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यह नेता कभी जीत न पाए
सुधन रावत और जितेंद्र यादव के सिर किसी भी चुनाव में जीत का सेहरा न बंध पाया। सुधन रावत मेयर चुनाव से लेकर विधानसभा और लोकसभा चुनाव लड़ चुके हैं। दल भी बदले, लेकिन जीत के समीकरण न बन पाए। 2012 में वह मेयर चुनाव में जीतते-जीतते रह गए। मतगणना पूरी होने के बाद प्रशासन ने उन्हें विजेता घोषित कर दिया था, लेकिन भाजपा के टिकट पर उनके सामने चुनाव लड़ रहे दिवंगत मेयर तेलूराम कांबोज और अन्य भाजपाई दोबारा मतगणना की जिद पर अड़ गए। बाद में तेलूराम कांबोज विजयी घोषित किए गए। इसी तरह सपा नेता जितेंद्र यादव भी चुनाव में जीत हासिल न कर पाए। वह गाजियाबाद और बुलंदशहर की सिकंदराबाद सीट से चुनाव लड़ चुके हैं, लेकिन जनता का साथ न मिला। बाद में सपा ने उन्हें एमएलसी बनाकर विधान परिषद भेजा।
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इन विधायकों को बार-बार मिला मौका
क्षेत्र की जनता ने कई नेताओं को बार-बार विधायक बनाया। उनके काम करने का अंदाज भी अलग था। इसमें सदर विधानसभा से तेजा सिंह के बाद प्यारे लाल शर्मा और बालेश्वर त्यागी तीन-तीन बार विधायक बने। लगातार न सही, लेकिन सुरेंद्र मुन्नी भी तीन बार विधायक रहे हैं और अब फिर मैदान में हैं। मुरादनगर से ईश्वर दयाल, राजपाल त्यागी, मोदीनगर से कांग्रेस नेता सुखबीर सिंह गहलौत और भाजपा नेता नरेंद्र सिसौदिया भी लगातार कई बार विधायक बनकर विधानसभा में पहुंचे हैं। वहीं रमेश चंद तोमर गाजियाबाद-हापुड़ लोकसभा क्षेत्र से लगातार चार बार सांसद रहे। हालांकि बाद में वह विधानसभा का चुनाव हार गए थे।
ये रहा विधायकों का रिकॉर्ड
- मुरादनगर सीट से 1967 में विधायक रहे जीएस चौधरी 1969 में तीसरे नंबर पर रहे।
- मुरादनगर सीट पर 1977 में विधायक बने अनवर फिर विधायक नहीं बने।
- 1985 में मुरादनगर विधानसभा क्षेत्र के विधायक सखावत हुसैन 1989 में तीसरे नंबर पर रहे।
- 1993 में मुरादनगर सीट से ही विधायक बने प्रेम सिंह भी 1994 में हार गए और चौथे नंबर पर रहे थे।
- 2012 में वहाब चौधरी विधायक बने, 2017 में मोदीनगर से चुनाव लडे़ लेकिन दूसरे नंबर पर रहे।
- मोदीनगर से सुदेश शर्मा तीन बार चुनाव लड़े, एक बार जीते और दो बार हारे, अब चौथी बार गठबंधन के प्रत्याशी हैं।
- साहिबाबाद सीट से अमरपाल शर्मा 2012 में एक बार विधायक बने, 2017 में हारे, फिर चुनाव मैदान में हैं।
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