तकनीकी युग में केंद्र से लेकर राज्यों की जांच एजेंसियों के लिए आर्थिक अपराध बड़ी चुनौती बना हुआ है। अब वित्तीय हेराफेरी और गबन करोड़ों-अरबों में हो रही है। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि आर्थिक अपराध शाखा की मेरठ ब्रांच (सेक्टर) में अकेले गाजियाबाद के आठ मामले लंबित हैं, जिनमें करीब 500 करोड़ रुपए से अधिक की हेराफेरी हुई है,
जबकि मेरठ शाखा के पास करीब 11 करोड़ रुपये से जुड़े गबन के मामले पंजीकृत है। मेरठ ब्रांच जिन मामलों की जांच कर रही है, उनमें सबसे बड़ा मामला राजनगर स्थित ट्रेडिंग कंपनी का है। कंपनी पर 380 करोड़ रुपये से अधिक की धनराशि विदेश भेजने का आरोप है।
आर्थिक अपराध शाखा के एसएसपी अनिल कुमार बताते हैं कि वर्ष 2015 में सेंट्रल की जांच एजेंसी ने कंपनी पर छापा मारा था, जिसमें करीब 250 से अधिक लोगों की वोटर आईडी व पैनकार्ड मिले थे। डिप्टी डायरेक्टर रेवन्यू (लखनऊ) की टीम ने छापामार कर खुलासा किया था, इस मामले में थाना कविनगर में एफआईआर भी दर्ज कराई गई।
बाद में यह मामला शासन की तरफ से आर्थिक अपराध शाखा को रेफर कर दिया गया। संबंधित कंपनी ने कंप्यूटर उपकरण मंगाने के लिए मोटी रकम विदेश भेजी, जबकि छापेमारी के दौरान कंप्यूटर के उपकरण मिले ही नहीं थे।
इसी तरह से कविनगर में करीब साढ़े तीन करोड़ रुपये के एक मकान का मामला है, जिसमें संबंधित पार्टी ने फर्जी तरीके से एक महिला को मालिक दिखाकर मकान अपने नाम करा लिया, इसमें बैंक से लोन भी हुआ। इसी तरह से सेल्स टैक्स में फर्जी तरीके से फर्म बनाकर गबन करने का मामला भी ईओडब्ल्यू के पास है।
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180 मामलों की जांच कर रही अपराध शाखा
आर्थिक अपराध शाखा के पास इंटेलिजेंस, विवेचना व जांच के मामले पहुंचे हैं। अभी तक मेरठ शाखा के पास 182 से अधिक मामले चल रहे हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के 17 जिलों को कवर करने वाली मेरठ शाखा में विवेचना के 38, जांच के 134 और इंटेलिजेंस के 10 हैं।
आर्थिक अपराध शाखा शासन की अनुशंसा पर ऐसे आर्थिक आपराधिक मामलों को देखती है, जिसमेें व्यापक पैमाने पर जनसमूह को नुकसान उठाना पड़ा हो। मौजूदा समय में जितने भी मामले आ रहे हैं, उनमें मोटी रकम की हेराफेरी हुई है।
- अनिल कुमार, एसपी- आर्थिक अपराध शाखा, मेरठ