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Ghaziabad News: भाजपा और कांग्रेस में बंट गए बसपा का वोट

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गाजियाबाद। गाजियाबाद लोकसभा सीट पर बसपा की हार कोई नई बात नहीं है। पहले भी हाथी मंजिल तक पहुंचने से पहले ही हांफता रहा है। फिर भी इस बार की हार में बसपा के लिए चुभन ज्यादा है, क्योंकि वोट बहुत कम मिले। बसपा के उम्मीदवार 1.93 लाख वोट तक पा चुके हैं जबकि इस बार चुनाव लड़े नंद किशोर पुंडीर को महज 75,525 वोट मिले हैं। साफ लग रहा है कि बसपा के बाकी वोट कांग्रेस और भाजपा में बंट गए।
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पिछले चुनाव में बसपा का उम्मीदवार नहीं था। सपा के साथ गठबंधन था। उम्मीदवार थे सुरेश बंसल। उन्हें 4.5 लाख से ज्यादा वोट मिले थे। माना गया था कि बसपा के वोट सपा को मिल गए। इससे पहले देखें तो 2014 में बसपा के उम्मीदवार मुकुल उपाध्याय को 1,73,085 वोट मिले। 2009 में अमरपाल शर्मा को 1,80,285 वोट, 2004 में अय्यूब अली को 1,80,068 वोट, 1999 में खालिद को 1,93,221 वोट, 1996 में अनवर अहमद को 1,26,194 वोट मिले थे।



इस बार हाथी की हालत सबसे ज्यादा खराब हुई है। किसी भी विधानसभा क्षेत्र में बसपा को 25,000 तक वोट नहीं मिले। गाजियाबाद सदर में 14 हजार से भी कम मिले हैं। साहिबाबाद में 14,449 वोट मिले हैं। यहां 2012 के विधानसभा चुनाव में बसपा ने जीत दर्ज की थी। 1,24,33वोट मिले थे।
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12 साल में 20 फीसदी रह गए वोट



2012 के विधान सभा चुनाव में हाथी बड़ी तेजी से चला था। जिले की पांच विधान सभा सीटों में से चार पर जीत दर्ज की थी। बसपा सिर्फ मोदीनगर हारी थी और दूसरे स्थान पर रही थी। जिले में कुल 3,85,193 वोट मिले थे। इससे तुलना करें तो इस चुनाव में 20 फीसदी ही वोट मिले हैं। जैसे प्रदेश में बसपा की स्थिति कमजोर होती चली गई, वैसे ही गाजियाबाद में भी नजर आ रही है।









हाथी की हालत पतली (मुरादनगर)



बूथ संख्या भाजपा कांग्रेस बसपा



250. 502 158 04



254. 350 54 05



258. 285 73 02



261. 258 59 01



278. 181 146 01



282. 210 112 00



284. 352 163 01



310. 415 68 08



311. 405 87 08



315. 493 157 26







हार की प्रमुख वजह



संगठन की कमजोरी



भाजपा की तरह बसपा का संगठन मजबूत नहीं है। दस साल पहले तक भाईचारा कमेटी बनती थीं। अब नहीं रहीं। संगठन में बदलाव भी जल्दी-जल्दी होते रहे। इसका भी सकारात्मक असर नहीं हुआ।



उम्मीदवार बदलना



बसपा ने इस बार पहले पंजाबी समाज के उम्मीदवार अंशय कालरा को उतारा। उन्होंने चुनाव प्रचार शुरू कर दिया। इसके बाद अचानक उनका टिकट काट दिया। उनकी जगह नंद किशोर पुंडीर को टिकट दे दिया।



उत्साह की कमी



लगातार हार से कार्यकर्ताओं में उत्साह कम होता जा रहा है। विधानसभा, नगर निगम और लोकसभा चुनाव में बसपा को एक के बाद एक हार ही मिल रही है। ऐसे में कई नेता और कार्यकर्ता दूसरे दलों में जा चुके हैं।
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