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Ghaziabad News: अजेय दुर्ग में भाजपा की एक और विजय

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गाजियाबाद। एक और चुनाव। भाजपा की एक और विजय। जीत दर जीत का यह सिलसिला चुनाव दर चुनाव बड़ी आसानी से आगे बढ़ता जा रहा है। 2008 में हुए परिसीमन के बाद से गाजियाबाद लोकसभा सीट पर भाजपा अजेय बनी हुई है। यह लगातार चौथी जीत है। मुकाबला कभी सपा से हुआ तो कभी कांग्रेस से लेकिन कमल का फूल खिलने में कभी मुश्किल नजर नहीं आई।
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इन नतीजों ने भाजपा हाईकमान को इतना बेफिक्र कर दिया है कि अब यहां जोखिम भरे प्रयोग भी किए जाने लगे हैं। इसके बावजूद चुनावी कहानी में कोई परिवर्तन नहीं आ रहा। कौन सोच सकता है कि जिस गाजियाबाद सीट पर भाजपा के टिकट पर सिर्फ क्षत्रिय उम्मीदवार जीते हों, वहां पार्टी वैश्य कार्ड चलेगी। इस बार ऐसा ही किया।
टिकट भी किसका काटा, वीके सिंह का, जो लगातार दो चुनाव पांच लाख से ज्यादा वोटों से जीते। इसके बावजूद कमल का फूल ही खिला। भाजपा पहला चुनाव 1984 में लड़ी थी। इसमें जमानत जब्त हो गई थी। 1991 में पहली बार कमल खिला। तब से अब तक नौ चुनाव हो चुके हैं। आठ में भाजपा जीती है। लोग कहने लगे हैं, कहीं कुछ भी हो जाए लेकिन गाजियाबाद में तो कमल ही खिलेगा।
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जीत मिलना अलग बात है और आसानी से जीत जाना। गाजियाबाद में भाजपा हर चुनाव बड़ी आसानी से जीत रही है। हर बार जीत भी बड़ी मिल रही है। पांचों विधानसभा क्षेत्रों में भाजपा बढ़त ले रही है। पिछले चुनाव में धौलाना में जरूर पिछड़ गई थी लेकिन इस बार पांचों में आगे रही।

जिले में पांचों विधायक भाजपा के
जिले में पांच विधानसभा सीटें हैं। पांचों भाजपा के पास है। 2017 में भी पांचों पर कमल खिला था। 2022 में पांचों विधायकों को फिर से मैदान में उतारा गया। पांचों सीटों पर कमल खिला। जीत का अंतर और बढ़ गया। साहिबाबाद में तो ऐसी जीत मिली कि इतिहास ही रच गया। सुनील शर्मा की 2.14 लाख वोटों की जीत इंडिया बुक आफ वल्र्ड रिकाॅर्ड में दर्ज की गई।


मेयर चुनाव में हर बार मिली जीत

1995 में नगर निगम के गठन के बाद से 2023 तक हुए छह आम चुनाव और एक उपचुनाव में विपक्षी दलों का कोई भी प्रत्याशी भाजपा के इस दुर्ग को भेदकर मेयर की कुर्सी तक नहीं पहुंच पाया है। इसके उलट हर बार इस सीट पर भाजपा की जीत बड़ी होती चली गई। 2023 में सुनीता दयाल को 2.87 लाख के अंतर से प्रचंड जीत मिली।


जिला पंचायत भी भगवा रंग में रंगी

जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनाव में भी भाजपा को ही जीत मिली। 2021 में ममता त्यागी अध्यक्ष चुनी गईं। हालांकि, जिला पंचायत सदस्यों के चुनाव में भाजपा की हालत खराब हो गई थी लेकिन संगठन के प्रबंधन ने अध्यक्ष के मुकाबले में जीत दिला दी। ममता त्यागी निर्विरोध अध्यक्ष चुनी गईं थीं। 14 सदस्य वाली जिला पंचायत में भाजपा के सिर्फ दो सदस्य जीते थे।
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कांग्रेस की एक और हार
हेडिंग - 20 साल बाद भी नहीं बदले हाथ के हालात
सबहेड- 2004 के बाद गाजियाबाद लोकसभा सीट पर एक भी चुनाव नहीं जीत सकी है कांग्रेस
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बार उतरे हैं कांग्रेस के उम्मीदवार
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चुनाव में मिली है शिकस्त
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बार दर्ज की है जीत

माई सिटी रिपोर्टर

गाजियाबाद। परिसीमन के बाद गाजियाबाद लोकसभा सीट पर कांग्रेस एक भी चुनाव नहीं जीत सकी है। अब तक चार मुकाबले हुए हैं। चारों में कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा। परिसीमन से पहले 2004 में कांग्रेस के सुरेंद्र प्रकाश गोयल ने ही भाजपा के विजय रथ को रोका था। तब से अब तक 20 साल हो गए। हाथ के हालात बदल नहीं रहे।
1957 से 2024 तक कांग्रेस ने 15 बार उम्मीदवार उतारे हैं। इनमें जीत पांच बार मिली है जबकि हार का सामना इससे दोगुना यानी दस बार करना पड़ा है। इस बार डाॅली शर्मा बड़ी जोर-शोर से चुनाव लड़ीं लेकिन जीत की मंजिल तक नहीं पहुंच पाईं। सपा और कांग्रेस के गठबंधन पर भाजपा और रालोद का तालमेल भारी पड़ा।
डाॅली शर्मा लगातार दूसरी बार हारी हैं। हालांकि, सबसे ज्यादा हार का सामना कांग्रेस के दिग्गज रहे बीपी मौर्य को करना पड़ा था। वह कुल पांच बार चुनाव लड़े। चार बार कांग्रेस और एक बार आरपीआई से। कांग्रेस के टिकट पर तीन बार हारे और एक बार जीते। आरपीआई के टिकट पर भी हारे थे। हारने वाले उम्मीदवारों में रीटा सिंह चौथे स्थान पर रहीं। अन्य सभी दूसरे और तीसरे स्थान पर रहे।


डाॅली शर्मा की हार की हैट्रिक

कांग्रेस के टिकट पर डाॅली शर्मा गाजियाबाद में तीन चुनाव लड़ी हैं। तीनों में हार का मुंह देखा है। इस तरह उनकी हार की हैट्रिक बन गई है। वह पहली बार 2017 में मेयर का चुनाव लड़ीं। इसमें दूसरे स्थान पर रहीं। उन्हें 1,19,091 वोट मिले थे। इसके बाद 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के वीके सिंह के सामने मैदान में उतरीं। वह तीसरे स्थान पर रहीं। उन्हें 1,11,944 वोट मिले। इस बार लोकसभा चुनाव में उन्हें ........ वोट मिले और वह भाजपा के अतुल गर्ग से हार गईं।
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संगठन की कमजोरी पड़ रही भारी
कांग्रेस की हार की बड़ी वजह संगठन की कमजोरी मानी जा रही है। इस बार भी डाॅली शर्मा अकेले दम पर किला फतह करने की कोशिश करती नजर आईं। संगठन के कई नेता उनकी नैया पार कराने के लिए जी जान से नहीं जुटे। कांग्रेस के अलग-अलग गुटों के बीच समन्वय कर पाना भी उम्मीदवार के लिए चुनौती भरा रहता है।


कब-कब मिली जीत
वर्ष उम्मीदवार वोट

1957 कृष्ण चंद्र शर्मा 1,64,831
1962 कमला चौधरी 81,999

1971 बीपी मौर्य 2,22,496
1984 केदारनाथ सिंह 2,54,823
2004 सुरेंद्र गोयल 2,35,114
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कब-कब मिली हार
वर्ष उम्मीदवार वोट

1967 कमला चौधरी 33,988

1977 बीपी मौर्य 1,32,667

1980 प्रेम मोहन 1,46,257

1989 बीपी मौर्य 2,13,933

1991 बीपी मौर्य 1,61,838

1996 रीटा सिंह 1,24,948

2009 सुरेंद्र गोयल 2,68,956

2014 राज बब्बर 1,91,222

2019 डाॅली शर्मा 1,11,944


सपा के साथ से भी नहीं बनी बात

सपा का साथ मिलने से कांग्रेस के वोट तो बढ़ गए। खासकर मुस्लिम इलाकों में डाॅली शर्मा को खूब वोट मिले लेकिन इतना भर काफी नहीं था। सपा इस सीट पर कभी जीत नहीं पाई है। कांग्रेस 2004 में जीती थी। इसके बाद 2014 में कांग्रेस का रालोद से गठबंधन था। राज बब्बर उम्मीदवार थे। तब भी दो लाख से कम वोट मिले थे।


हेडिंग - बसपा का क्षत्रिय कार्ड नहीं चला... जमानत हो गई जब्त

सबहेड - लगातार आठवीं बार हाथी की हार, उम्मीदवार बदला पर नतीजे पर नहीं पड़ा कोई असर

माई सिटी रिपोर्टर
गाजियाबाद। गाजियाबाद लोकसभा सीट पर चुनाव की दौड़ में बसपा का हाथी एक बार फिर मंजिल पर पहुंचने से बहुत पहले ही हांफ गया। यह बसपा की आठवीं बार हार है। इस बार पार्टी अध्यक्ष मायावती ने नए समीकरण बनाने का प्रयास किया था लेकिन बात बनी नहीं। यह पहला मौका था जब यहां क्षत्रिय समाज का उम्मीदवार उतारा लेकिन यह तीर भी निशाने पर नहीं लगा। इससे पहले हर बार ब्राह्मण या मुस्लिम उम्मीदवार उतारे गए।
इस बार पहले अंशय कालरा को उम्मीदवार घोषित किया गया था। वह चुनाव की तैयारियों में जुटे ही थे कि पत्ता साफ हो गया। उनकी जगह मुजफ्फरनगर के रहने वाले नंद किशोर पुंडीर को टिकट थमा दिया गया। बसपा हाईकमान को उम्मीद थी कि क्षत्रिय समाज के वोट नंद किशोर को मिल जाएंगे। परंपरागत दलित और क्षत्रिय वोटर मिल गए तो नंद किशोर का बेड़ा पार हो सकता है। लेकिन, ये सब ख्यालों और ख्वाबों की बातें रहीं। हकीकत में ऐसा कुछ नहीं हुआ। दलितों के वोट भी एकतरफा नहीं पड़े।

पिछले चुनावों में बसपा को मुस्लिम वोटों में से बड़ा हिस्सा मिलता रहा। लेकिन, इस बार मुस्लिमों का रुझान कांग्रेस-सपा गठबंधन की तरफ रहा। इसलिए, बसपा की स्थिति और खराब हो गई। हालांकि, इस बार भी स्थान तीसरा ही रहा। 1996 से हर चुनाव में बसपा तीसरे स्थान पर रही है। 2019 में बसपा का उम्मीदवार नहीं था। सपा और बसपा का गठबंधन था। सीट सपा के कोटे में गई थी।



रैली में उम्मीद से कम जुटी थी भीड़
बसपा अध्यक्ष मायावती की रैली 21 अप्रैल को कविनगर रामलीला मैदान पर हुई थी। पिछली रैलियों की तुलना में इसमें भीड़ कम जुटी थी। हर बार बसपा की रैली में मुस्लिमों की काफी संख्या रहती थी लेकिन इस बार भागीदारी कम थी। तभी लग गया था कि हाथी की हालत ठीक नहीं है। बसपा के रोड शो में भी रंग फीका ही रहा था।


रणनीति में भी हो गई चूक

नंद किशोर पुंडीर से एक रणनीतिक चूक भी हो गई। उनकी पत्नी कविता और भतीजे अभिषेक ने निर्दलीय पर्चा भरा। नामांकन वापसी के आखिरी दिन दोनों का पर्चा वापस नहीं लिया जा सका। ऐसे में एक ही परिवार के तीन उम्मीदवार आमने सामने हो गए। इसका मतदाताओं में सही संदेश नहीं गया। नंद किशोर को इसके लिए कई जगह सफाई देनी पड़ी।


चुनाव दर चुनाव हाथी की चाल



वर्ष उम्मीदवार वोट स्थान

1989 सुलेमान 4,492 पांचवां

1991 मशाहिद अली 481 बारहवां

1996 अनवर अहमद 1,26,194 तीसरा

1999 खालिद 1,93,221 तीसरा

2004 अय्यूब अली 1,80,068 तीसरा

2009 अमरपाल शर्मा 1,80,285 तीसरा

2014 मुकुल उपाध्याय 1,73,085 तीसरा

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हेडिंग - महिला सांसद के लिए बढ़ा इंतजार

सबहेड - 1957 से अब तक सिर्फ एक ही महिला उम्मीदवार जीत सकी है चुनाव



माई सिटी रिपोर्टर
गाजियाबाद। देश की आजादी को लगभग 77 साल होने को आ गए हैं। 17 बार लोकसभा चुनाव भी हो चुके हैं लेकिन गाजियाबाद में सिर्फ एक महिला सांसद ही बन पाईं हैं। इस बार 18वीं लोकसभा चुनाव में कांग्रेस से महिला प्रत्याशी डॉली शर्मा मैदान में थीं लेकिन वह जीत नहीं पाईं।
लोकसभा चुनाव हो या विधानसभा चुनाव महिला उम्मीदवारों पर कम ही भरोसा जताया जाता है। गाजियाबाद में अभी तक हुए लोकसभा चुनाव हों या विधानसभा चुनाव महिलाओं को मुश्किल से ही टिकट मिल पाया है। आधी आबादी के सरोकार की बड़ी- बड़ी बातें करने वाले राजनीतिक दल टिकट बंटवारे के समय महिला उम्मीदवारों को अनदेखा कर देते हैं। लोकसभा चुनाव का इतिहास देखें तो यही लगता है।
1962 में कांग्रेस की नेता कमला चौधरी ने चुनाव लड़ा था और वह जीत गई थी। उसके बाद सीधे 1996 में रीता चौधरी ने अपनी दावेदारी पेश की थी। हालांकि वह चुनाव हार गईं थीं। इसके बाद वर्ष 2014 में आम आदमी पार्टी ने शाजिया इल्मी को चुनावी समर में उतारा था। वह भी जीत नहीं पाई थीं।


मोदीनगर के नाम है दो महिला विधायक का रिकाॅर्ड

विधानसभा चुनाव पर भी नजर डालें तो यहां से सिर्फ दो महिला विधायक चुनी गई हैं। आजादी के बाद 1952 में शुरू हुए विधानसभा चुनावों पर नजर डालें तो जिले में सिर्फ मोदीनगर ही ऐसी विधानसभा सीट रही है, जिसपर दो बार महिला विधायक जीती हैं। पहली बार 1985 में विमला सिंह कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़कर विधानसभा पहुंचीं थीं, मंजू शिवाच 2017 से भाजपा से विधायक हैं। वह दो बार चुनाव जीत चुकी हैं।



महापौर के पद पर मिली जीत
नगर निगम के महापौर के पद पर महिला उम्मीदवारों को जीत मिली है। पिछले चुनाव में भाजपा से सुनीता दयाल रिकाॅर्ड वोटों से जीतीं। इससे पहले भाजपा से ही आशा शर्मा महापौर रहीं। सिर्फ ये दोनों ही नहीं। सुनीता और आशा से पहले दमयंती गोयल भी महापौर रह चुकी हैं।
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