गाजियाबाद। बंदरों की बढ़ती आबादी, उनके भोजन की कमी, जिंदा रहने की स्थिति और बंदरों के आए दिन लोगों पर हमला करने के मामले पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायामूर्ति अरुण भंसाली और न्यायमूर्ति क्षिति शैलेंद्र ने मंगलवार को एक जनहित याचिका पर नोटिस जारी किया है। उच्च न्यायालय ने केंद्र और राज्य सरकार से विस्तृत जवाब मांगा है। अदालत ने 10 जुलाई तक इस पर कार्रवाई की रिपोर्ट प्रस्तुत करने को कहा है।
यह याचिका गाजियाबाद के समाजसेवी विनीत शर्मा और बीटेक छात्रा प्रजक्ता सिंघल ने दायर की है। याचिका में बंदरों की बढ़ती संख्या और उनके कारण हो रहे संघर्ष को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की गई है। इस कारण से लोगों को न सिर्फ मानसिक और शारीरिक परेशानी का सामना करना पड़ रहा है, बल्कि बंदरों को भी भोजन की गंभीर कमी का सामना करना पड़ रहा है। याचिका में मांग की गई है कि एक आपातकालीन कार्रवाई योजना तैयार की जाए, जिसमें बंदरों के लिए उचित चिकित्सकीय देखभाल केंद्र, भोजन की पर्याप्त व्यवस्था, उनके पुनर्वास के लिए वन क्षेत्रों में स्थानांतरण और शिकायत हेल्पलाइन पोर्टल की स्थापना शामिल हो। इसके अलावा बंदरों के लिए बचाव वाहनों की पर्याप्त संख्या और प्राथमिक चिकित्सा केंद्रों की स्थापना की भी आवश्यकता जताई गई है।
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए अधिवक्ता आकाश वशिष्ठ व पवन तिवारी ने अदालत को बताया कि समस्या इस स्तर तक बढ़ चुकी है कि हर समुदाय, खासकर बुजुर्गों, महिलाओं और बच्चों के लिए गंभीर हो गई है। गाजियाबाद में स्कूलों को भी छात्रों की सुरक्षा को लेकर दिक्कतें आ रही हैं। वशिष्ठ ने यह भी कहा कि भारत सरकार की पशु कल्याण बोर्ड इस मुद्दे पर सलाह देने वाली सर्वोच्च संस्था है, अब तक इस समस्या के समाधान के लिए कोई योजना तैयार नहीं कर सका है, जबकि यह मुद्दा अत्यंत गंभीर और चिंता का विषय बन चुका है। उन्होंने यह भी कहा कि नगर निगम और नगरपालिकाओं की जिम्मेदारी है कि वे इस तरह के उत्पातों को नियंत्रित करें और सुरक्षा सुनिश्चित करें। उन्होंने यह भी कहा कि यह याचिका संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मानव और पशु दोनों के अधिकारों की संतुलन की मांग करती है, विशेषकर बंदरों के भोजन के अधिकार को लेकर।