इतिहासकार सद्दीक मेव ने बताया कि महात्मा गांधी ने घासेडा में लोगों के बीच अपना ऐतिहासिक भाषण दिया। उस समय गांधी जी ने कहा था कि आज मेरे कहने में वह शक्ति नहीं रही, जो पहले हुआ करती थी। अगर मेरे कहने में पहले जैसा प्रभाव होता, तो आज देश का एक भी मुसलमान भारत को छोड़कर जाने की जरूरत नहीं समझता और न ही किसी हिंदू व सिख को पाकिस्तान में अपना घर छोड़कर भारत में शरण लेने की जरूरत पड़ती।
उन्होंने अपने संबोधन में दुख प्रकट करते हुए कहा था कि यहां जो कुछ हो रहा है उसे सुनकर मेरा दिल भर जाता है। चारों ओर आगजनी, लूटपाट, कत्लेआम, जबरदस्ती, धर्मपरिवर्तन, मंदिर, मस्जिद और गुरुद्वारों को तोड़ना, यह सब कुछ केवल पागलपन है, इसे रोका नहीं गया, तो सभी जातियों का सर्वनाश हो जाएगा।
गांधी जी ने अपने भाषण में मुस्लिम प्रतिनिधियों द्वारा दिए गए शिकायत पत्र की प्रति लाखों लोगों को पढ़कर सुनाई और कहा कि उन्हें पूरा मान-सम्मान और सुरक्षा दिलाई जाएगी। अगर किसी सरकारी अधिकारी ने कोई अत्याचार किया तो उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।
उन्होंने कहा कि मेरे शब्द लोगों के दुख में थोड़ा ढांढस बंधा सकें, तो खुशी होगी। अलवर और भरतपुर की रियासतों से जबरदस्ती निकाले गए मुसलमानों पर दुख प्रकट किया। कहा कि भारत में एक समय आएगा, जब सारी नफरत जमीन में दफना दी जाएगी और फिर अमन-चैन से सभी समाज रह सकेंगे। उनके आश्वासन और विचारों का मुसलमानों पर इतना असर हुआ की उन्होंने पाकिस्तान जाने का अपना इरादा बदल दिया।
गांव बूबलहेड़ी निवासी 96 वर्षीय रमजान नंबरदार का कहना है कि जिस समय महात्मा गांधी ने यह भाषण दिया वह उस समय मौके पर मौजूद थे और उनकी आयू करीब 23-24 साल की रही होगी। वे उन्हें गांधी नाम से कम पर उघाडा (बिना कपड़ों वाले) नाम से जानते थे।
फजरूदीन बेसर, बशीर अहमद, रमजान चौधरी, शौकत अली का कहना है कि गांधी जी के सुरक्षा का आश्वासन देने के बाद यहां के मुसलमान रुक गये थे। अगर उस समय नहीं रुकते, तो हरियाणा और राजस्थान में एक भी मुसलमान नहीं होता।