साइबर सिटी में हुए सीएलयू और लाइसेंस देने की जांच अभी ढींगरा आयोग कर ही रहा है कि हाईकोर्ट ने पूर्ववर्ती सरकार के एक फैसले को गलत बताते हुए कई हाउसिंग सोसायटियों के लाइसेंस रद्द कर दिए हैं।
मामला हुडा सेक्टर 63ए का है। इसमें कोर्ट ने ग्रुप हाउसिंग सोसायटियों के लाइसेंस और सीएलयू रद्द कर दिए हैं। इससे करीब पांच हजार निवेशकों पर असर पड़ेगा। बिल्डरों की ओर से लाईसेंस लेकर अपार्टमेंट बनाने का काम लगभग पूरा किया जा चुका है।
पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट के आदेश पर हुडा के मास्टर प्लान में सेक्टर 63ए के सभी ग्रुप हाउसिंग लाईसेंस निरस्त कर दिए गए हैं। अदालत के इस आदेश का असर सीधे 4800 से अधिक निवेशकों पर पड़ रहा है।
गुड़गांव गांव के रहने वाले पवन भाटिया की याचिका पर अदालत ने यह फैसला सुनाया था। जिला नगर योजनाकार विभाग और बिल्डरों को इस आदेश की प्रति आने का इंतजार है।
याचिकाकर्ता ने पूर्व सरकार में रेवड़ी की तरह बांटे गए ग्रुप हाउसिंग लाईसेंसों और एग्रीकल्चर से रिहायशी में किए गए सीएलयू (भू-उपयोग परिवर्तन) व उसके सिस्टम पर सवाल उठाए हैं।
उसका आरोप है कि सरकार ने उसके फाइल लगाने की वरिष्ठता के हिसाब से उसको लाईसेंस न दे कर किसी को फायदा दिया। उनका लाइसेंस जान बूझकर रद्द कर दिया गया।
उल्लावास गांव की जमीन पर बसा है सेक्टर
-हुडा का मास्टर प्लान 2025 आने से पहले होने वाले विस्तार को देखते हुए बिल्डरों ने पूरी जमीन खरीदी। मास्टर प्लान में सेक्टर 63 ए उल्लावास गांव की जमीन पर काटा गया है।
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: सेक्टर 63 ए 394.56 एकड़ पर बसा है।
: इसमें सेक्टर रोड 15.70 एकड़ पर कटी है।
: सेक्टर में नेट प्लान एरिया 378.86 एकड़ है।
: इसके 20 प्रतिशत (75.77 एकड़) में ग्रुप हाउसिंग सोसायटी के लाईसेंस दिए गए हैं।
क्या है नियम:
-टाउन एंड कंट्री प्लानिंग के हिसाब से कम से कम दस एकड़ जमीन पर ग्रुप हाउसिंग लाईसेंस दिया जाता है।
-एक ग्रुप हाउसिंग सोसायटी में 630 फ्लैट बनते हैं। इस हिसाब से अलग-अलग बिल्डरों की ओर से 4800 से अधिक फ्लैटों का लाईसेंस मिला है।
यह होती है लाइसेंस लेने की प्रकिया
-किसी भी सेक्टर में ग्रुप हाउसिंग सोसायटी का लाइसेंस लेने के लिए उस सेक्टर के बनने के नोटिफिकेशन के बाद आवेदन होता है। फाइल जमा करने के वरिष्ठता क्रम के हिसाब से बिल्डर को मौका मिलता है। फाइल की स्क्रूटनी होती है।
यदि किसी बिल्डर के आवेदन फाइल में गड़बड़ी होती है तो कायदे से विभाग को उसे सूचित कर बताना चाहिए। कागजात पूरे न कर पाने की हालत में ही उसे वरिष्ठता सूचीक्रम से निकाला जा सकता है।
जानकार बताते हैं कि इसी स्क्रूटनी में ही सारा खेल होता है। आरोप है कि अधिकारियों ने जानबूझकर उसकी फाईल रिजेक्ट कर दी। लाईसेंस अपने चहेतों को दिया।
सरकार एक एसआईटी गठित कर इस तरह के सभी मामलों की जांच कराए। यहां पर लाइसेंस और सीएलयू देने में भारी धांधली की गई है। बिना विस्तृत जांच के पीड़ितों को राहत नहीं मिल सकती। -आरएस राठी, अध्यक्ष, गुड़गांव सिटीजन काउंसिल