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पांच गलतियां जो बीजेपी से छीन सकती हैं दिल्ली की गद्दी

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दिल्ली विधानसभा चुनाव में जीत के लिए बीजेपी ने अपने सभी दांव आजमा लिए हैं। अवैध कॉलोनियों को वैध करने की घोषणा से लेकर किरण बेदी को सीएम पद का उम्मीदवार और ओबामा के भारत दौरे का राजनीतिकरण तक सबकुछ।
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इन सब के बावजूद लगता ऐसा है कि बीजेपी और अमित शाह टीम के सारे दांव खाली चले गए। बहुत ज्यादा समय की बात नहीं है जब ओपीनियन पोल या सर्वे यह बता रहे थे कि भाजपा बहुत आसानी से अन्य राज्यों की तरह ही दिल्ली में भी सत्ता के करीब है।

कहा जा रहा था कि दिल्ली में आम आदमी पार्टी बीजेपी को कड़ी टक्कर देगी और कांग्रेस का कहीं अता-पता नहीं होगा। लेकिन कुछ ही दिनों में चीजें तेजी से बदलती हुई दिख रही हैं।
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इन सबके बीच एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है कि आखिर ऐसा कौन सा दांव है जो बीजेपी के लिए उलटा साबित हुआ? यहां पर हम वो पांच कारण बता रहे हैं जो बीजेपी की राह में रोड़ा बन सकते हैं और पार्टी को बहुमत से दूर कर सकते हैं।

किरण बेदी को सीएम का उम्मीदवार बनाना

जिस दिन से पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने किरण बेदी को सीएम पद का उम्मीदवार बनाया है उस दिन से पार्टी में रोष का माहौल है।
 
हालांकि पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं ने ऐसी बातों को गलत कहा है पर कृष्‍णा नगर में किरण बेदी के रोड शो से लेकर पब्लिक मीटिंग तक में सहभागिता की कमी इस ओर साफ संकेत कर रही है कि पार्टी कार्यकर्ताओं में उत्साह की कमी है।

इतना ही नहीं सीटों के बंटवारे के अगले ही दिन 20 जनवरी को बीजेपी कार्यकर्ताओं ने पार्टी के दिल्ली कार्यालय के बाहर विरोध प्रदर्शन किया जिसे संभालने के लिए पुलिस बुलानी पड़ी।

साथ ही सार्वजनिक जीवन में बड़ा नाम होने के बावजूद बीजेपी की सीएम पद की उम्मीदवार किरण बेदी अपनी रैलियों में ज्यादा भीड़ जुटा पाने में नाकामयाब रही हैं।

सूत्रों की मानें तो अमित शाह के एक करीबी ने बताया है कि शाह इस बात से काफी चिंतित हैं कि बेदी को दिल्ली के लोगों का पूरा समर्थन नहीं मिल रहा है। राजनीति के धुरंधर भी इस बात को लेकर पूरी तरह आश्वस्त नहीं हैं कि किरण को पार्टी में लाना मास्टरस्ट्रोक है या सबसे बड़ी गलती।

टिकटों का गलत बंटवारा

किरण बेदी को सीएम उम्मीदवार बनाना ही काफी नहीं था कि पार्टी ने अपने पार्टी के दिग्गज नेताओं के रहते हुए पूर्व आप और कांग्रेस नेताओं को पार्टी में न केवल शामिल किया बल्कि टिकट भी दे दिया।

पूर्व कांग्रेस नेता कृष्णा तीरथ, पू्र्व आप नेता विनोद कुमार बिन्नी व एमएस धीर को टिकट दिया गया वहीं पार्टी के अध्यक्ष सतीश उपाध्याय तक को टिकट नहीं दिया गया।

पार्टी आलाकमान की इसी नीति पर एक बीजेपी नेता ने कहा कि हमारे पास बहुत से ऐसे नेता हैं जो स्थानीय स्तर पर दशकों से बहुत अच्छा काम कर रहे हैं। यहीं नहीं स्थानीय लोग उनका बहुत आदर व सम्मान भी करते हैं। ऐसा होने पर भी समझ में नहीं आता कि क्यों‌ दूसरी पार्टी के गलत सदस्यों को पार्टी में शामिल किया गया।

पार्टी नेता ही खड़ी कर रहे मश्किल

लोकसभा चुनाव के बाद से हिंदुत्व ताकतों के उभर के आने के कारण मोदी सरकार में लोगों का विश्वास कुछ घटा है। आए दिन कोई न कोई नेता या सांसद कुछ ऐसा कह देता है जो पार्टी की छवि को मलिन कर रहा है।

चाहे वो साध्वी निरंजना का रामजादा या हरामजादा वाला विवादित बयान हो या फिर उत्तर प्रदेश से सांसद साक्षी महाराज का मदरसों में आतंकवाद की ट्रेनिंग दिए जाने वाला बयान।

इन सब का नतीजा यह हुआ है कि दिल्ली का शहरी मतदाता कुछ न कुछ भाजपा से दूर जरूर ‌हुआ है जिसमें अल्पसंख्यक समुदाय भी शामिल है।

हालांकि इस मुद्दे पर पीएम मोदी कई बार बोल चुके हैं और सामाजिक सौहार्द्र बनाए रखने की अपील कर चुके हैं लेकिन जो नुकसान हो चुका है उसकी भरपाई कर पाना मुश्किल है।

आज का युवा मतदाता सेक्यूलर विचारधारा वाला है और वह इस तरह के मत रखने वाली पार्टी को कभी वोट देना पसंद नहीं करता।

आप निकली आगे

एक अन्य बात जो बीजेपी को इन चुनाव में पीछे करती है वह है आप का प्रचार अभियान जो चुनाव की घोषणा होने के दो महीने पहले से ही चल रहा है।

जहां आप ने अपने अधिकतर उम्मीदवार 2014 के दिसंबर में ही घोषित कर दिए थे, वहीं उसका प्रचार अभियान नवंबर से ही शुरू हो गया था।

बीजेपी की बात की जाए तो उसने अपने कैंडिडेट पिछले हफ्ते ही घोषित किए हैं और उनके पास एक महीने का भी समय नहीं है कि वो घर-घर जाकर चुनाव प्रचार कर सकें।

इसके साथ ही आप ने दूसरे राज्यों से भी प्रचार करने के लिए वॉलेंटियर्स बुला रखे हैं। इन राज्यों में बैंगलुरू, मुंबई, हैदराबाद, पंजाब और हरियाणा के कार्यकर्ता शामिल हैं।
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ओपिनियन पोल के चिंताजनक संकेत

हालांकि नवंबर में एबीपी-नील्सन ने बीजेपी को दिल्ली में पूर्ण बहुमत दिया था‌ जिसमें 70 में से 46 सीटें बीजेपी को मिल रही थीं। लेकिन उसके बाद से काफी कुछ बदल गया है।

एक हालिया सर्वे में आप के वोट शेयर में 9 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। 2013 में आप का वोट शेयर 24.9% से बढ़कर 33.9% हो गया है। जबकि बीजेपी का वोट शेयर मात्र 5 प्रतिशत बढ़ा है।

हालांकि इन दोनों ही पोल सर्वे में जो सबसे दिलचस्प बात है वो ये कि अरविंद केजरीवाल राजधानी के लोगों के लिए सीएम पद की पहली पसंद बने हुए हैं। दिल्ली 43 प्रतिशत वोटर्स केजरीवाल को जबकि मात्र 39 प्रतिशत लोग बेदी के फेवर में हैं।
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