गुरदेव सिंह की उम्र भले ही 71 वर्ष हो गई है, लेकिन उनमें जज्बे में कोई कमी नहीं। पंजाब के गांव से किसानों के समर्थन में पहुंचे गुरदेव सिंह के कानों में अपने बेटे को दिए वचन का एक-एक शब्द गूंज रहा है। घुटनों की सर्जरी के बाद भी जीत के भरोसे ने ही बुजुर्ग को इस आंदोलन में शामिल होने की ताकत दी है। जालंधर के नूरपुर गांव के गुरदेव पिछले 13 दिन से सिंघु बॉर्डर पर डटे रहने वाले बुजुर्गों में से एक हैं। तीनों कृषि कानूनों को रद्द करने की लड़ाई में शामिल किसान का कहना है कि अपने घरों से सैकड़ों किलोमीटर की दूर होने पर जज्बा कम नहीं हुआ है।
पिछली पीढ़ियों को याद करते हुए गुरदेव सिंह ने कहा कि उनके परिवार के लोग शुरू से ही खेती पर निर्भर रहे हैं। वे अपने पूर्वजों के सम्मान और बच्चों के अधिकारों की लड़ाई के लिए दिल्ली आए हैं। चार महीने पहले घुटने की सर्जरी हुई, लेकिन अभी भी बगैर सहारा नहीं चल सकते हैं। उन्होंने बताया कि उनके बड़े बेटे ने कहा था कि इस लड़ाई को जीतने के बाद ही घर आना।
ट्रैक्टर-ट्रॉली से नीचे उतरने के लिए उन्हें भले ही सहारे की अभी भी जरूरत है, लेकिन इससे बेफिक्र किसानों के साथ हैं। नूरपुर के गुरदेव सिंह के दोस्त सज्जन सिंह और प्रीतम सिंह ने भी उनके जज्बे को सलाम करते हुए कहा कि अपने बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए आए हैं। 60 वर्षीय सज्जन सिंह की भी दो वर्ष पहले सर्जरी हुई थी, जबकि रिटायर्ड प्रीतम सिंह भी अपनी शारीरिक परेशानियों को भूलकर किसानों के हक की लड़ाई में बढ़-चढ़कर शामिल हो रहे हैं।
सज्जन सिंह की पुत्रवधू ने बेटी को जन्म दिया है, जिसे देखने की भी दादा की इच्छा है, लेकिन उन्होंने भी भावी पीढ़ी के लिए दिल्ली की सीमा पर ही डटे रहने का निर्णय लिया है। प्रीतम सिंह की तबीयत खराब होने लगी है, जिनकी सेहत का मेडिकल कैंप के डॉक्टर लगातार नजर रख रहे हैं। 65 वर्षीय जोगिंदर सिंह ने कहा कि कई साथी देश की सीमाओं पर डटे रहे हैं। किसानों के हक के लिए हमें यह मौका मिला है। उनकी मांगे पूरी होने के बाद ही लौटेंगे।