बाजारों में पसंद की जा रही है मिट्टी, गोबर और बीज से बनी मूर्ति
काजल कुमारी
फरीदाबाद। गणेश चतुर्थी का पर्व नजदीक आते ही शहर के बाजारों में रौनक बढ़ गई है। सेक्टर-16 स्थित हुडा मार्केट, एनआईटी-एक की मार्केट, जवाहर कॉलोनी, सेक्टर-15 हुडा मार्केट और बल्लभगढ़ के बाजारों में ऐसी इको-फ्रेंडली मूर्तियों की बिक्री शुरू हो चुकी है। जहां हर साल प्लास्टर ऑफ पेरिस (पीओपी) की मूर्तियां बिकती थीं। वहीं, इस बार पर्यावरण को ध्यान में रखते हुए इको-फ्रेंडली मूर्तियों की ओर रुझान बढ़ा है।
मूर्तिकारों ने इस बार ऐसी मूर्तियां तैयार की हैं जो मिट्टी, गोबर और बीज जैसे प्राकृतिक तत्वों से बनाई गई हैं। इन पर हानिकारक पेंट की जगह प्राकृतिक रंगों का प्रयोग किया गया है, जिससे पूजा के बाद इन्हें विसर्जित करने पर पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुंचेगा। मूर्तिकारों ने बताया कि यह मूर्तियां घर में भी एक से दो घंटों के अंदर पानी में पूरी तरह मिट्टी के रूप में घुल जाती है।
दुकानदारों का कहना है कि इस बार लोग पर्यावरण को लेकर जागरूक हैं और पीओपी की बजाय प्राकृतिक तत्वों से बनी मूर्तियां अधिक पसंद कर रहे हैं। ग्राहकों का मानना है कि पूजा के साथ-साथ पर्यावरण की रक्षा करना भी हर व्यक्ति की जिम्मेदारी है।
मूर्तिकारों ने बताया कि मिट्टी, गोबर और नारियल के छिलकों से बनी मूर्तियों की खासियत यह है कि विसर्जन के बाद ये पूरी तरह से घुलकर मिट्टी में मिल जाती हैं। इससे न केवल नदियों और तालाबों का प्रदूषण कम होगा, बल्कि समाज को स्वच्छ और स्वस्थ वातावरण भी मिलेगा।
दूसरी ओर, पर्यावरण विशेषज्ञ भी लगातार लोगों से अपील कर रहे हैं कि पीओपी से बनी मूर्तियों से परहेज करें। उनका कहना है कि प्लास्टर ऑफ पेरिस पानी में घुलता नहीं है, जिससे नदियों और तालाबों का जल प्रदूषित होता है और जलीय जीवों के जीवन पर बुरा असर पड़ता है।
त्योहार से पहले बाजारों में इन मूर्तियों की मांग को देखते हुए मूर्तिकारों और दुकानदारों को भी राहत मिली है। उनका कहना है कि लोगों की सोच बदल रही है और आने वाले समय में केवल इको-फ्रेंडली मूर्तियों की ही परंपरा रहेगी। गणेश चतुर्थी का पर्व आस्था और उत्साह का प्रतीक है, और इस बार यह पर्व पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी दे रहा है।
वर्जन
इस बार ऐसी मूर्तियां तैयार की हैं जो मिट्टी, गोबर और बीज जैसे प्राकृतिक तत्वों से बनाई गई हैं। - रमेश, मूर्तिकार
लोगों की सोच बदल रही है और आने वाले समय में इको-फ्रेंडली मूर्तियों की ही परंपरा रहेगी। - केशव ठाकुर, दुकानदार