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दो राज्यों के राजनीतिक गणित में खास रहा ‘खोरी गांव’

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फरीदाबाद (कैलाश गठवाल)। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अरावली के बाद खोरी गांव को न सिर्फ छह सप्ताह में तोड़ने की कवायदें तेज हुई हैं बल्कि उसके बसने को लेकर भी चर्चाएं हैं। हालांकि दिल्ली-हरियाणा बॉर्डर पर बसे इस गांव को राजनीतिक लिहाज से भी खास माना जाता है। इसकी पहचान दिल्ली और हरियाणा दोनों राज्यों में है। यहां के लोगों की वोट वैल्यू इतनी है कि एकतरफा वोट से विधायक या सांसद चुनाव को पलटने की भी ताकत रखते हैं।
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स्थानीय लोगों से चुनावी प्रत्याशियों ने न सिर्फ समस्याओं पर बात की, बल्कि वो सपने दिखाए जो साफ तौर पर अवैध कब्जे को मालिकाना हक दिलाने का दावा करते हैं। स्थानीय लोगों का वोट बैंक आधा दिल्ली की सत्ता को जाता है, तो आधा हरियाणा सरकार का है। चुनावी दंगल में यहां सांसद-विधायक पद के दावेदार रहे तमाम प्रत्याशी हाथ जोड़कर लोगों से वोट मांगकर ले गए। हालांकि लगातार तीसरी बार अवैध तरीके से बसाए गए खोरी गांव पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद तोड़फोड़ का संकट गहराया हुआ है। ऐसे में अब लोगों को समझ आ गया है कि चुनावी मौसम में जो उम्मीद के बादल नेताओं के साथ आए थे, वो अब छट चुके हैं।
भौगोलिक स्थिति की बात करें तो यहां समतल जगह पर बने मकानों के सामने की गलियों में टाइल लगी हुई हैं। कुछ घरों के सामने सरकारी मीटर भी है। डाकखाना, सरकारी व निजी स्कूल और स्ट्रीट लाइट की सुविधाएं चुनावों की देन हैं। चुनाव जीतने के बाद भले ही यहां कोई नेता झांकने भी न आए, लेकिन चुनावी मौसम में विकास की बयार जरूर बहती है। यहां रह रहे जितेंद्र कुमार का कहना है कि चुनाव के समय यहां सभी कार्य मुफ्त में होते हैं। वोट लेने के लिए दिल्ली और हरियाणा दोनों तरफ के नेता व उनके सभी काम करवा देते थे।
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बड़खल और तुगलकाबाद विधानसभा के हैं वोटर
गांव में रहने वाले लोग बड़खल और तुगलकाबाद विधानसभा के वोटर हैं। लोगों के पास खुद के घर का प्रमाणपत्र भले ही न हो, लेकिन दो विधायकों को सत्ता में लाने की ताकत इनके पास है। यहां करीब 5200 वोटर हरियाणा के हैं और करीब ग्यारह हजार दिल्ली के। यह आंकड़ा हर चुनाव में बढ़ता चला जाता है। आसपास के गांव और सोसाइटी के रेंट एग्रीमेंट से इनका एड्र्ेस प्रूफ बनवाया जाता है। इसके बाद बैंक खाते और अन्य कागजात की मदद से वोटर आईडी तैयार करवा दी जाती है। फिलहाल बड़खल विधानसभा से सीमा त्रिखा विधायक हैं, जिन्हें यहां से काफी संख्या में वोट मिले थे। वहीं आम आदमी पार्टी के सहीराम तुगलकाबाद से विधायक हैं। उन्हें भी यहां के लोगों ने भारी मतों से विजयी बनाया था। यहां की पक्की गलियों पर लगे खंभों पर फरीदाबाद व दिल्ली के सांसदों के नाम भी विकास कार्य करवाने के लिए लिखे हुए हैं।
सुविधाओं की वजह से गांव छोड़ने को तैयार नहीं हैं लोग
गांव में जितनी परेशानियां हैं, उतनी सुविधाएं भी हैं। इसके चारो तरफ से संगम विहार, तुगलकाबाद, लालकुआं सहित महरौली रोड लगता है। इस रोड को 24 घंटे चलने वाला मार्ग कहा जाता है। इन मार्गों पर चलने वाली ज्यादातर टैक्सी, ऑटो, रेहड़ियां व छोटे-मोटे काम खोरी गांव के लोग ही करते हैं। बॉर्डर के पास बनी सोसाइटी व महंगे इलाकों में खोरी गांव की महिलाएं घरेलू सहायिका का काम करती हैं। दोनों राज्यों से कमाई का साधन होने का लालच भी इन लोगों को यहां से जाने नहीं देता है। वहीं यहां रहने वाले कुछ आपराधिक किस्म के युवक दिल्ली में अपराध करने के बाद यहां शरण लेते हैं। इलाका हरियाणा का होने के कारण पुलिस में सीमा विवाद रहता है। शराब व गांजे का कारोबार यहां से बखूबी चलता है। बॉर्डर होने के कारण दोनों तरफ तस्करी करना आसान है। छोटी-छोटी गलियों व संकरे इलाकों में अपराधियों को ढूंढना भी आसान नहीं होता है।
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फोटो फाइल-11, 12, 13, 14 (पक्की सड़कें, सरकारी स्कूल, केंद्रीय राज्यमंत्री की ओर से सड़क शिलान्यास का लगा बोर्ड)
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