फरीदाबाद में राजनेताओं के संरक्षण और अधिकारियों की मिलीभगत के चलते नगर निगम की 182 एकड़ बेशकीमती जमीन पर कब्जा हो चुका है। हैरानी की बात यह है कि निगम के पास कब्जा हटाने की कोई तैयारी नहीं है। पिछले दिनों जिला उपायुक्त के साथ निगम अफसरों की हुई बैठक में ये बात सामने आई है। यही नहीं निगम सीमा क्षेत्र में करीब 4500 एकड़ जमीन का मामला कोर्ट में विचाराधीन है। जिन जमीन पर कब्जे हुए पड़े हैं या मामला कोर्ट में विचाराधीन है, उसकी कीमत 100 रुपये से अधिक की बताई जा रही है।
आंकड़ों पर नजर डालें तो एनआईटी, ओल्ड जोन और बल्लभगढ़ निगम सीमाक्षेत्र में 170.23 एकड़ में झुग्गियां बसी हुई हैं। इसके अलावा 11.55 एकड़ में अन्य लोगों ने कब्जा कर रखा है। यही नहीं तीनों जोन में 4593.77 एकड़ जमीन का मामला कोर्ट में विचाराधीन है।
दस वर्षों में कब्जा हटाने को नहीं हुआ काम
निगम सूत्रों की मानें तो अधिकारियों की लापरवाही के चलते ही अवैध कब्जे तेजी से पनप रहे हैं। इनको हटाने के लिए दस वर्षों में न तो कोई योजना बनी और न ही अधिकारियों ने कब्जा हटाने को लेकर दिलचस्पी दिखाई। यही कारण है कि निगम की बेशकीमती जमीन कब्जे की भेंट चढ़ रही है। निगम का अपनी जमीन को न बचा पाना निगम अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़ा करता है।
सत्ता पार्टी के इशारों पर हुए कब्जे
नगर निगम के पूर्व सलाहकार केएल गेरा का कहना है कि जब-जब राज्य में जिस-जिस पार्टी की सरकार रही है, उसी पार्टी के लोगों ने या तो कब्जा खुद किया या फिर बड़े पैमाने पर कब्जा कराया। ऐसा नहीं है कि निगम अधिकारियों को इस बात की जानकारी नहीं थी, बावजूद अवैध कब्जे को लेकर कोई अधिकारी कभी गंभीर नहीं दिखाई दिया। आरटीआई एक्टिविस्ट एवं पद्श्री डॉ. ब्रह्मदत्त का कहना है कि सरकारी जमीन पर कब्जा बगैर विभागीय अधिकारियों व कर्मचारियों की मिलीभगत से नहीं हो सकता। जिन अधिकारियों के कार्यकाल में कब्जे हुए हैं, उनके खिलाफ भी कार्रवाई होनी चाहिए।
निगम अधिकारी बोलने को तैयार नहीं
निगम की जमीन पर बड़े पैमाने पर कब्जे हुए पड़े हैं लेकिन अपनी लापरवाही छिपाने के लिए कोई अधिकारी मुंह खोलने को तैयार नहीं है। निगमायुक्त से लेकर संयुक्त आयुक्त तक ने इस मामले में चुप्पी साध रखी है।