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रणनीति के साथ ‘भाइयों’ ने बसाया अवैध खोरी

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फरीदाबाद (कैलाश गठवाल)। ‘भाई’ एक ऐसा शब्द जिसे सुनकर अपनेपन और सुरक्षा का भाव मन में आता है, लेकिन खोरी गांव में भाई शब्द का इस्तेमाल लोगों को डराने और उन पर हुकूमत चलाने के लिए किया जाता है। सर्वोच्च न्यायालय से फैसला आने के बाद दिल्ली और हरियाणा के बॉर्डर पर बसे खोरी गांव में तोड़फोड़ की प्रक्रिया की शुरुआती औपचारिकता शुरू हो चुकी है। अमर उजाला की टीम ने शनिवार को गांव के हालात जाने तो सामने आया कि रणनीति के साथ भाइयों ने अवैध गांव बसा दिया हे। वहीं यहां की करीब एक लाख की आबादी को घर के नाम पर सिर्फ जमीन का कब्जा बेचा गया है।
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लोगों ने बताया कि इस इलाके में सरकार का नहीं बल्कि ‘भाई’ का राज चलता है। यह भाई कौन है, इस पर खुलकर बात करने से लोग डरते हैं। एक बुजुर्ग ने दबी आवाज में बताया कि करीब 30 साल पहले वह यहां आकर बसे। उन्हें बताया गया था कि दिल्ली के इलाके में सस्ते में प्लॉट मिल जाएगा। किराए से बचने के लिए उन्होंने यहां 200 रुपये गज के हिसाब से जमीन ली थी। मकान बनाने के बाद से उन्हें आजतक कोई सरकारी सुविधा नहीं मिली। बिजली, पानी, केबल और राशन तक के लिए उन्हें भाई पर निर्भर रहना पड़ता है। इन्हीं भाइयों की गैंग इस पूरे इलाके में सक्रिय है। इनका खौफ इतना है कि इनकी मर्जी के बिना इस इलाके में कोई कुछ नहीं कर सकता।
14 रुपये यूनिट बिजली और हजार रुपये का पानी
गांव में बिजली, पानी, स्कूल जैसी सभी सुविधाएं मौजूद हैं। बस इनका दाम सामान्य लोगों से अलग है। यहां भाइयों की गैंग ने प्राइवेट बिजली का जाल फैला रखा है। दिल्ली से बिजली की सप्लाई ली जाती है। इसके बाद सभी घरों पर प्राइवेट मीटर लगाए गए हैं। यहां 600 रुपये का बिल हर महीने फिक्स है, जिसमें मात्र 40 यूनिट बिजली दी जाती है। इसके ऊपर 14 रुपये यूनिट के हिसाब से भुगतान करना होता है। मैदानी इलाके में पानी की निजी लाइन डाली हुई है। जिसमें सुबह-शाम पानी देने के बदले में हर घर से दो हजार रुपये महीना लिया जाता है। ऊंचाई पर बने मकानों में हजार रुपये प्रति टैंकर के हिसाब से पानी दिया जाता है। केबल हो या राशन की दुकान सभी पर इन्हीं का कब्जा है।
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मकान के नहीं हैं कागजात
खोरी गांव में रह रहे लोगों के पास ऐसा कोई कागज नहीं है, जिसके आधार पर उन्हें उनके कब्जे वाले मकान का मालिक कहा जा सके। दरअसल यहां बने मकानों के सिर्फ कब्जा ही बिका। जमीन लेने के बाद यदि किसी ने यहां एक-दो महीने में अपना कब्जा नहीं किया, तो भाई के आदमी उस जमीन को दूसरे को बेच देते हैं। यहां मकान बनाना भी इतना आसान नहीं। एक स्थानीय युवक के मुताबिक वन विभाग, दिल्ली पुलिस, हरियाणा पुलिस, दिल्ली बिजली विभाग व भाई के आदमी सभी को खर्चा देना होता है। पांच हजार से 10 हजार तक सभी का अलग-अलग खर्च है। बने हुए मकान का दाम फिक्स नहीं है। यहां दो लाख से 15 लाख तक के मकान हैं। कागज के नाम पर बस कब्जा ही बिकता है। (संवाद)
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