नई दिल्ली। दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि मोटर वाहन अधिनियम की धारा 146 के तहत सरकारी वाहनों को अनिवार्य बीमा से छूट मिलने का मतलब यह नहीं है कि सरकारी प्राधिकरण दुर्घटना के पीड़ितों को मुआवजा देने से बच सकते हैं। न्यायमूर्ति अनीश दयाल की एकल पीठ ने रोहताश कुमार बनाम संगीता वर्मा एवं अन्य मामले में यह फैसला दिया। मामले में 2014 में एमसीडी के ट्रक ने एक मोटरसाइकिल को पीछे से टक्कर मार दी थी, जिसमें 26 वर्षीय सर्विस तकनीशियन की मौत हो गई थी। मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण ने मृतक के कानूनी वारिसों को करीब 22.05 लाख रुपये का मुआवजा दिया था और ड्राइवर तथा एमसीडी को संयुक्त रूप से जिम्मेदार ठहराया था। ड्राइवर ने अपील में तर्क दिया कि एमसीडी को पूर्ण जिम्मेदारी लेनी चाहिए, जबकि एमसीडी ने 50 प्रतिशत मुआवजा देने का प्रस्ताव रखा। अदालत ने स्पष्ट किया कि सरकार के स्वामित्व वाले वाहनों के लिए अनिवार्य बीमा से छूट के बावजूद, अधिनियम के तहत वैधानिक फंड बनाने का प्रावधान है। इस फंड के माध्यम से तीसरे पक्ष के दायित्वों को पूरा करना प्राधिकरण की जिम्मेदारी है।
न्यायालय ने कहा कि मोटर वाहन अधिनियम पीड़ितों के हित में बनाया गया कल्याणकारी कानून है। फंड न बनाने या न बनाए रखने का बहाना पीड़ितों को मुआवजा से वंचित नहीं कर सकता। एमसीडी ट्रक के मालिक और नियोक्ता के रूप में पूरी तरह से प्रतिनिधिक दायित्व के तहत जिम्मेदार है। अदालत ने एमसीडी को पूरा मुआवजा ब्याज सहित चार सप्ताह के अंदर अदा करने का निर्देश दिया और ड्राइवर के खिलाफ निष्पादन कार्रवाई को रद कर दिया। एमसीडी चाहे तो सेवा नियमों के तहत ड्राइवर के खिलाफ कार्रवाई कर सकती है।