-चेहरे में टेढ़ापन, हाथ में कमजोरी और लड़खड़ाती आवाज को न करें नजरअंदाज
अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। स्ट्रोक में समय पर इलाज मिलने से मरीज की जान बचाने के साथ स्थायी दिव्यांगता का खतरा भी कम किया जा सकता है। चेहरे का एक तरफ झुकना, हाथ-पैर में अचानक कमजोरी आना और बोलने में परेशानी होना इसके प्रमुख लक्षण हैं। ऐसे संकेत दिखने पर घरेलू उपचार करने या लक्षणों के अपने आप ठीक होने का इंतजार करने के बजाय तुरंत अस्पताल पहुंचना चाहिए।
एम्स न्यूरोसाइंस सेंटर के प्रमुख डॉ. शैलेश बी. गायकवाड़ के अनुसार स्ट्रोक एक गंभीर चिकित्सकीय आपातस्थिति है। इसमें मस्तिष्क के किसी हिस्से में रक्त की आपूर्ति बाधित हो जाती है या रक्तवाहिका फटने से रक्तस्राव होने लगता है। इसके दो प्रमुख प्रकार हैं। इस्केमिक स्ट्रोक में रक्त का थक्का मस्तिष्क की रक्तवाहिका को अवरुद्ध कर देता है। जबकि हेमरेजिक स्ट्रोक में रक्तवाहिका फटने से मस्तिष्क में खून बहने लगता है। दोनों का उपचार अलग-अलग होता है।
चेहरे और आवाज में बदलाव खतरे का संकेत
उन्होंने कहा कि स्ट्रोक की पहचान के लिए फएएसटी का सिद्धांत याद रखना चाहिए। इसमें चेहरे(फेस) का एक तरफ झुकना, हाथ(आर्म) में अचानक कमजोरी और बोलने(स्पीच) में परेशानी प्रमुख संकेत हैं। अचानक नजर कमजोर होना, संतुलन बिगड़ना और तेज सिरदर्द भी स्ट्रोक के लक्षण हो सकते हैं। लक्षण शुरू होने का समय(टाइम) नोट करना जरूरी है। इससे डॉक्टरों को इलाज तय करने में मदद मिलती है। लक्षण कुछ मिनट में ठीक हो जाएं, तब भी अस्पताल जाना चाहिए। यह टीआईए यानी बड़े स्ट्रोक का चेतावनी संकेत हो सकता है।
शुरुआती घंटों में इलाज से बच सकती है जान
अस्पताल में सीटी स्कैन या एमआरआई से स्ट्रोक के प्रकार का पता लगाया जाता है। इस्केमिक स्ट्रोक के चुनिंदा मरीजों को लक्षण शुरू होने के साढ़े चार घंटे के भीतर थक्का घोलने वाली दवा दी जा सकती है। बड़ी रक्तवाहिका में थक्का होने पर उपयुक्त मरीजों में मैकेनिकल थ्रोम्बेक्टॉमी से कैथेटर के जरिए थक्का निकाला जा सकता है। चयनित मरीजों में यह प्रक्रिया 24 घंटे तक लाभकारी हो सकती है। रक्तस्राव वाले स्ट्रोक में रक्तचाप नियंत्रण और जरूरत पड़ने पर सर्जरी की जाती है।
बीपी और मधुमेह नियंत्रित रखना जरूरी
उन्होंने बताया कि हाई ब्लड प्रेशर, मधुमेह, बढ़ा कोलेस्ट्रॉल, हृदय रोग, धूम्रपान, मोटापा और शारीरिक निष्क्रियता स्ट्रोक का खतरा बढ़ाता हैं। नियमित व्यायाम, संतुलित आहार, स्वास्थ्य जांच और इन जोखिम कारकों पर नियंत्रण से खतरा कम किया जा सकता है। स्ट्रोक के बाद फिजियोथेरेपी और स्पीच थेरेपी भी मरीज को सामान्य जीवन में लौटने में मदद करती हैं।