नेताजी की दिलचस्पी शिक्षा में नहीं है। इसलिए फरीदाबाद-पलवल जिले के विद्यार्थियों को उच्च शिक्षा के क्षेत्र में दिल्ली पर निर्भर रहना पड़ रहा है। सामान्य शिक्षा के लिए न तो यहां यूनिवर्सिटी है, न पर्याप्त कॉलेज और न ही अच्छे कोर्स।
विद्यार्थियों से जुड़े संगठन इस बार विधानसभा चुनाव में यह मुद्दा प्रत्याशियों के समक्ष उठाएंगे। इनसे जुड़ी कुछ समस्याएं विधायक आनंद कौशिक ने मुख्यमंत्री के समक्ष उठाई थीं, लेकिन उनका समाधान नहीं हो सका।
विद्यार्थी संगठन आरोप लगा रहे हैं कि जिन युवा वोटरों को लेकर पार्टियां दंभ भर रही हैं उनके नेता ही ऐसे मुद्दे नहीं उठा रहे। कोई यह नहीं कह रहा कि कब यहां यूनिवर्सिटी, कॉलेज बढ़ेंगे। कब अच्छे कोर्स आएंगे और विद्यार्थियों की दिल्ली पर निर्भरता कम होगी।
देना पड़ेगा जवाब, आखिर ऐसा क्यों?
अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की पूर्व जिलाध्यक्ष डॉ. सीमा भारद्वाज का कहना है कि विधानसभा चुनाव लड़ने वाले प्रत्याशियों को इस बार युवाओं के सभी सवालों के जवाब देने होंगे। क्योंकि हर पार्टी का प्रत्याशी केवल युवाओं के वोट से बदलाव की बात कह रहा है। लेकिन युवाओं का सबसे ज्यादा शोषण हो रहा है।
के जिलाध्यक्ष अनिल चेची ने बताया कि कई बार संघर्ष के माध्यम से कॉलेज के विद्यार्थियों की समस्या का समाधान कराने का प्रयास किया गया। लेकिन अभी भी बहुत से मुद्दे हैं, जिन्हें हल कराया जाना बाकी है।
असल में ये हैं प्रमुख मुद्दे
-शहर में सामान्य शिक्षा के लिए सरकारी यूनिवर्सिटी नहीं
-टेक्निकल यूनिवर्सिटी वाईएमसीए है, जिसके कैंपस के लिए शहर में जगह नहीं मिल रही।
-पर्याप्त कॉलेजों की संख्या नहीं
-कॉलेजों में शिक्षकों की भारी कमी
-कॉलेज तक पहुंचने के लिए ट्रांसपोर्ट सिस्टम नहीं
-एमडीयू का रीजनल सेंटर नहीं
यह समाधान तत्काल होने चाहिए...
-महिला स्पेशल डिब्बे की तरह विद्यार्थी स्पेशल डिब्बा लगाया जाए
-कॉलेज तक पहुंचने के लिए विद्यार्थी स्पेशल बस चले
-स्थाई शिक्षकों की कॉलेजों में नियुक्ति की जाए
-सीटों की संख्या प्रति वर्ष 25 फीसदी की दर से बढ़े
-एमडीयू का रीजनल सेंटर खोला जाए
ठेके पर युवा शिक्षकों को लगाया जा रहा है
-कॉलेजों में ठेके पर युवा शिक्षकों को लगाया जा रहा है। उन्हें केवल 10-15 हजार रुपये का वेतन दिया जा रहा है। जबकि वहीं पर नियमित शिक्षकों को 80 से 90 हजार रुपये का वेतन मिल रहा है। ऐसे में इतने बड़े स्तर पर वेतन विसंगति होने पर युवा शिक्षकों में कुंठा की भावना उत्पन्न हो रही है।
-पिछले कई वर्ष से लगातार प्रदेश में एमडीयू की साख पर बट्टा लग रहा है। कभी परीक्षा परिणाम में गलत अंक देने के मामले को लेकर विद्यार्थी सड़क पर उतरते हैं तो कभी मार्कशीट या डिग्री नहीं देने की बात कही जाती है। लेकिन खुद में सुधार करने की बजाए एमडीयू प्रशासन विद्यार्थियों पर ही गलती का ठीकरा फोड़ देता है। इस समस्या को लेकर कभी भी किसी राजनीतिक दल ने आवाज नहीं उठाई।