दिल्ली के एक डॉक्टर ने अपने पेशे का इस्तेमाल आत्महत्या के लिए किया, लेकिन सर गंगा राम के डॉक्टरों ने उसे बचा लिया। डाईजॉक्सिन दवा की अधिक मात्रा लेने से शरीर में फैले जहर को खत्म करने के लिए पहली बार चारकोल डायलिसिस का सहारा लिया गया।
अभी तक इस दवा से फैले जहर को खत्म करने केलिए एंटीबॉडी फ्रैग्मेंट (एफएवी) का इस्तेमाल किया जाता था। यह अमेरिका से मंगवाया जाता था और एक डोज की कीमत एक लाख रुपये होती थी।
नई पद्धति से महज दस हजार रुपये की दवा से मरीज की जान बचाई गई। नई पद्धति से जहर के प्रभाव को खत्म करने की विधि पहली बार भारत में अपनाए जाने की खबर को अब इंडियन जर्नल ऑफ क्रिटिकल केयर ने मार्च-2014 के अंक में प्रकाशित किया है।
मरने के लिए भी अपनाए डॉक्टरी फॉमूले
दिल्ली के एक बड़े अस्पताल में काम कर रहे 32 वर्ष का एक डॉक्टर अपनी निजी जीवन से परेशान होकर बिना दर्द के आत्महत्या करने की तैयारी करने का मामला जून 2013 का है। उसने डाईजॉक्सिन की 100 गोली खा ली।
ज्यादा मात्रा में गोली खाने की वजह से उसके हृदय की गति बढ़ गई और हृदय आघात का खतरा बढ़ गया। उसने खून में शुगर का स्तर कम करने के लिए 1600 यूनिट इंसुलिन ले ली। इससे वह कोमा में जाने लगा और कुछ समय बाद ब्रेन डेड की कगार पर चला जाता।
इतना ही नहीं इन दोनों दवाओं के अत्यधिक सेवन से उसे घबराहट और परेशानी न हो, इससे बचने के लिए उसने प्रोप्रानोलोल दवा ले ली, लेकिन फौरन उसने घटना की सूचना अपने परिजनों को दे दी। इसके बाद उसे सर गंगा राम अस्पताल के क्रिटिकल केयर यूनिट में भर्ती कराया गया था।
ऐसे कम किया गया जहर का असर
डॉईजॉक्सिन दवा के प्रभाव को खत्म करने के लिए चारकोल डायलिसिस दिया गया तो 15 घंटे बाद डॉईजॉक्सिन का स्तर घटने लगा। बेचैनी की वजह से हुई दिक्कत को दूर करने के लिए ग्लूकागोन इंजेक्शन दिया गया।
जबकि खून में इंसुलिन के स्तर को नियंत्रित करने के लिए 68 घंटे में धीरे-धीरे 1115 ग्राम ग्लूकोज चढ़ाया गया। छह दिन बाद मरीज की स्थिति सामान्य हो गई। मनोचिकित्सक से इलाज दिलवाने और स्वास्थ्य सामान्य होने के एक सप्ताह बाद डॉक्टर को अस्पताल से छुट्टी दे दी गई।
सर गंगा राम अस्पताल के क्रिटिकल केयर डिपार्टमेंट के वाइस चेयरमैन डॉ. सुमित रे ने कहा कि 25 साल के पेशे में ऐसा मामला नहीं देखा, जिसमें इतनी तरह की दवाएं खाकर आत्महत्या की दर्द रहित फुल प्रूफ कोशिश की गई हो।
15 से 20 लाख रुपये हो जाता खर्च
डॉ. सुमित रे ने कहा कि अन्य दवाओं के अत्यधिक सेवन से बनने वाले जहर के प्रभाव को तो खत्म किया गया था, लेकिन डॉईजॉक्सिन की वजह से फैले जहर को पहली बार चारकोल डायलिसिस से खत्म किया गया।
क्रिटिकल केयर डिपार्टमेंट के डॉ. आशीष गर्ग ने कहा कि पहले मरीज के शरीर से जहर के प्रभाव को खत्म करने के लिए अमेरिका से एंटीबॉडी फ्रैग्मेंट (एफएवी) मंगवाना पड़ता था।
इस मरीज में जहर की मात्रा को खत्म करने के लिए 15 से 20 डोज की जरूरत पड़ती। ऐसे में करीब 15 से 20 लाख रुपये खर्च होता, लेकिन चारकोल डायलिसिस की दो डोज में महज दस हजार रुपये खर्च करके खून में फैले जहर को निकाला गया।