नब्बे के दशक में एक गलत डायलॉग से फिल्म फ्लॉप हो जाती थी, लेकिन आज शुरू से आखिर तक फिल्म की कहानी ही समझ नहीं आती है। पहले किरदारों से ज्यादा कहानी को तवज्जो दी जाती थी, लेकिन आजकल हीरो, हीरोइन या फिर आइटम सांग को देखकर दर्शक फिल्म देखने जाते हैं।
पूरे साल में यदि 30 फिल्में प्रदर्शित होती हैं तो महज एक या दो ही जेहन में रहती हैं। ‘अमर उजाला’ से विशेष बातचीत में ये बातें मशहूर निर्माता, निर्देशक, लेखक, कहानीकार सुभाष घई ने कहीं।
उन्होंने कहा कि आज फिल्म मॉल कल्चर व उसके युवाओं के लिए बन रही हैं, जहां हाथों में हाथ डाले पॉपकॉर्न खाते दर्शक, सेक्स को देखकर शर्म नहीं बस एंजॉय करते हैं। जबकि पहले ऐसे सीन फिल्मों में नहीं डाले जाते थे। यही कारण है कि मॉल कल्चर को भुनाने के लिए स्क्रिप्ट भी विदेशी हो गई है। जबकि हिन्दुस्तान में किरदारों व कहानियों का खजाना छुपा है।