दिल्ली विधानसभा चुनाव के लिए अबकी बार जनता जर्नादन की कंजूसी देखने को मिली है। बीते 27 वर्षों में ऐसा दूसरी बार है जब राजधानी के चुनाव में मतदान गिरावट आई हो। शनिवार को दिल्ली की 70 विधानसभा सीटों में रात 9 बजे तक 61.46 फीसदी मतदान दर्ज किया गया। जबकि 2015 के विधानसभा चुनाव में ये 67 फीसदी से भी ज्यादा था। वर्ष 1998 में 12.76 तो इस बार करीब 6 फीसदी मतदान की कमी आई है।
नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) और एनआरसी के विरोध में प्रदर्शन कर रहा शाहीन बाग चुनाव के मुख्य मुद्दों में शामिल था। ऐसे में सियासत से लेकर जनता तक हर किसी की नजर मुस्लिम बहुल उन तमाम सीटों पर थी जहां विरोध प्रदर्शन चल रहे थे।
इन सीटों पर सुबह 8 बजे से ही पोलिंग बूथों पर मतदाताओं की लंबी लंबी लाइनें भी दिखाई दे रही थीं, लेकिन रात 9 बजे के बाद जब इन सीटों पर मतदान प्रतिशत देखा गया तो कुछ सीटों पर मतदान बढ़ा तो कुछ पर कम भी हुआ। जबकि दो से तीन सीटें ऐसी भी मिलीं जिन्होंने 2015 की तुलना में थोड़ा कम ही मतदान किया। मटिया महल विधानसभा में इस बार मतदान फीसदी में बढ़ोत्तरी हुई है।
पिछली बार 2015 के विधानसभा चुनाव में जब आम आदमी पार्टी को रिकॉर्ड 67 सीटों पर जीत हासिल हुई थी। उस चुनाव में इन्हीं मुस्लिम बहुल सभी सीटों पर मतदान वृद्घि देखने को मिली थी। तब परंपरा को तोड़ मुस्लिम मतदाता फस्र्ट क्लास पास हुआ था, लेकिन इस बार ओखला और बल्लीमारान विधानसभा क्षेत्र में मतदान प्रतिशत काफी नीचे आया है। फिलहाल यह कहना मुश्किल होगा कि वोटर किधर गए हैं। लेकिन मुस्लिम महिला मतदाताओं ने बराबरी की जिम्मेदारी जरूर निभाई है।
वहीं आरक्षित सीटों को लेकर बात करें तो दिल्ली में 70 में से 12 सीटें आरक्षित हैं। इन सीटों पर हमेशा ही दिल खोलकर मतदान किया जाता रहा है लेकिन इस बार यहां भी मतदाताओं की कंजूसी देखने को मिली। हालांकि इन सीटों पर मतदाताओं का रुझान किस ओर था? ये तो परिणाम आने के बाद ही पता चलेगा लेकिन त्रिलोकपुरी विधानसभा में बीते चुनावों की तुलना में इस बार मतदान सबसे कम हुआ है।