बृहस्पतिवार का दिन कश्मीर पंडितों के लिए यादगार दिन रहा। जब जम्मू कश्मीर विधानसभा ने घाटी में कश्मीरी पंडितों और अन्य प्रवासियों की वापसी के लिए अनुकूल माहौल बनाने के लिए सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पारित किया।
विभिन्न राजनैतिक दलों का कहना है कि दुर्भाग्यपूर्ण परिस्थितियों की वजह से कश्मीरी पंडितों, कुछ सिखों और मुसलमानों को 27 साल पहले घाटी छोड़कर जाना पड़ा था। विधानसभा में पारित प्रस्ताव से शहर में रह रहे करीब 10 हजार कश्मीरी पंडितों को ‘घर वापसी’ की उम्मीद जगी।
सेक्टर तीन में रह रहे कश्मीरी पंडितों से संवाददाता मुकेश शर्मा ने राय जानी। पेश है रिपोर्ट:-
हम जाना चाहते हैं और जाएंगे
विधानसभा में पारित प्रस्ताव अच्छा है। हम जन्मभूमि की रक्षा के लिए कश्मीर जाना चाहते हैं। ये पहली बार हुआ कि विधानसभा में हमारे लिए प्रस्ताव पारित हुआ है। लेकिन यह भी सच है इन राजनैतिक दलों की बातों पर हमें विश्वास नहीं है। ये सिर्फ पैसा लूटने की चाल हो सकती है। जब तक हमें कश्मीर के हालत ठीक नहीं लगेंगे। तब तक नहीं जाएंगे। हमें ‘पनुन (अपना) कश्मीर’ चाहिए। -बंसीलाल कौल
कभी नहीं समझा हमारा दर्द
चरमपंथ के कारण मेरे जैसे सैंकड़ों युवाओं ने अपना बचपन अपनी जन्मभूमि में नहीं बिता सके। सरकार से लेकर मानवाधिकार संगठन और बुद्विजीवियों ने कभी कश्मीरियों के दर्द को नहीं समझा। कश्मीरी पंडितों ने कश्मीर दहशत में नहीं, बल्कि भारतीयता बचाने के लिए छोड़ा था। जितनी जल्दी कश्मीर समस्या का राजनीतिक हल निकलेगा, उतनी ही जल्दी पंडितों की वापसी संभव हो पाएगी। -अमित पंडिता
मरने के लिए जाएं क्या कश्मीर
आखिरकार सरकार ने आंख खोल ली। हमारे दर्द को समझने का प्रयास किया। लेकिन क्या सरकार हमें सुरक्षा मुहैया कराएगी। एमपी, एमएलए जब भी कश्मीर क्षेत्र में जाते हैं, तो उन्हें पूरी सुरक्षा मिलती है। हमें मरने के लिए कश्मीर भेजना चाहते हैं। प्रस्ताव से आगे बढने की जरूरत है। पहले हमारी सुरक्षा की गारंटी दी जाए, इसके बाद हमें वापस भेजने के बारे में सोचा जाए।-उर्वशी कौल
पनुन कश्मीर स्थाई समाधान
कश्मीरी पंडित घर वापसी के लिए हर समय तैयार हैं, लेकिन उन्हें न तो जम्मू विधानसभा पर विश्वास है और न ही राजनैतिक दलों पर। पूर्व मुख्यमंत्री के बयान बार-बार बदलते रहते हैं। अगर राज्य और केंद्र सरकार कश्मीरी पंडितों की वापसी चाहती है तो इसका हल केवल पनुन कश्मीर है। जहां भारतीय संविधान लागू हो और इसको केंद्र शासित क्षेत्र का दर्जा दिया जाए। जिस प्रकार राज्य में हालात बने हैं, कश्मीर के विभाजन की सख्त जरूरत बन गई है। -डिगंबर रैना, संयोजक पनुन कश्मीर अभियान