मिशन रफ्तार के तहत स्टेशन यार्ड क्षेत्र को भी आधुनिक तकनीक से लैस किया जा रहा है। 3-6 किलोमीटर के स्टेशन यार्ड क्षेत्र में ट्रेनों की रफ्तार बढ़ाने पर जोर रेलवे दे रहा है ताकि आउटर (स्टेशन प्रवेश के पहले सिग्नल) पर पहुंच कर ट्रेनों की गति धीमी नहीं हो जाए। मेन लाइन के साथ ही लूप लाइन की भी औसत गति कम से कम 15 किलोमीटर प्रतिघंटा रहे।
रेलवे यार्ड क्षेत्र की रिमॉडलिंग कर औसत गति बढ़ा रहा है। नई दिल्ली व लुधियाना स्टेशन यार्ड में 15 किलोमीटर प्रतिघंटा की रफ्तार से ट्रेन चलने लगी है। इसका फायदा यह है कि स्टेशन पहुंचने के पहले ट्रेनों की लंबी-लंबी कतारें नहीं लगती है। यह गतिसीमा प्रतिबंध कम सिगनल ओवरलैप और दोनों छोरों पर डबल स्लिप के साथ डायमंड क्रॉसिंग के चलते बना हुआ था। इसका कर्वेचर भी क्लियर कर लिया गया है।
उत्तर रेलवे के महाप्रबंधक आशुतोष गंगल ने बताया कि उत्तर सर्कल के रेल संरक्षा आयुक्त ने लखनऊ स्टेशन के यार्ड क्षेत्र में रेलगाड़ियों के गतिसीमा प्रतिबंध को 10 किलोमीटर प्रतिघंटा से बढ़ाकर 15 किलोमीटर प्रतिघंटा करने की अनुमति दे दी है। इस तरह से नई दिल्ली, लुधियाना के बाद लखनऊ स्टेशन यार्ड में भी ट्रेनों की गति ज्यादा धीमी नहीं रहेगी।
आगे बताया कि लखनऊ कोचिंग यार्ड में लगभग 6 किलोमीटर रेलपथ पर रेलगाड़ियों का गतिसीमा प्रतिबंध 10 किलोमीटर प्रतिघंटा था। मानकनगर/आलमनगर की ओर से लखनऊ कोचिंग यार्ड में प्रवेश करने वाली हर रेलगाड़ी को लखनऊ प्लेटफॉर्म तक पहुंचने में लगभग 18 मिनट लगते थे। डायमंड क्रॉसिंग से होकर गुजरने वाले रेलपथ पर गतिसीमा को बढ़ाने का प्रस्ताव दिया गया था।
क्या होगा फायदा
यार्डों में स्थाई गतिसीमा बढ़ने से रेलगाड़ियों की आवाजाही में सुधार होगा। रेलगाड़ियों के आगमन और प्रस्थान में होने वाली देरी को बेहतर तरीके से नियंत्रित किया जाएगा। कर्वेचर यानी यार्ड परिसर तक रेल गाड़ियों के पहुंचने में लूप-लाइन पर भी ट्रेन की रफ्तार ज्यादा धीमी नहीं होगी और डिरेलमेंट का भी खतरा नहीं रहेगा। यात्रियों की यात्रा सुविधा और उनकी संरक्षा में सुधार लाने के लिए यह कवायद की जा रही है। क्योंकि 3-6 किलोमीटर के स्टेशन यार्ड क्षेत्र में ही गतिसीमा प्रतिबंध की वजह से घंटों लग जाते थे।