फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

जिंदगी गंवाने की कगार पर पहुंचे शख्स के लिए दिल्ली का अंजान प्रोफेसर बना मसीहा

Tue, 13 Dec 2016 11:10 AM IST
टीम डिजिटल/अमर उजाला, नई दिल्ली
विज्ञापन
जॉन और पॉल - फोटो : इंड‌‌ियन एक्सप्रेस
विज्ञापन
'आप मेरी अंधेरी जिंदगी में रोशनी की‌ किरण हैं।' पॉल के ऐसा कहने पर जॉन बोला- 'हम मानवता का धर्म मानने वाले हैं, हम भाई-भाई हैं।' ये पॉल और जॉन की तीन महीने पहले हुई मुलाकात की बातें हैं जो दोनों ने एक-दूसरे से पहली बार की थीं।
विज्ञापन


दोनों की मुलाकात पहली बार तब हुई जब जामिया हमदर्द यूनिवर्सिटी का मैनेजमेंट प्रोफेसर साखी जॉन 2500 किलोमीटर का सफर तय कर केरल के थ्रिसूर के एक छोटे से गांव पी‌ची शाजू पॉल से मिलने पहुंचा था। शाजू अपने गांव पीची में बस-क्लीनर(बस साफ करने वाला) का काम करता है।

आप सोच रहे होंगे कि आखिर हम इन दो व्यक्तियों की कहानी आपको क्यों सुना रहे हैं। तो इसके पीछे एक बहुत बड़ी वजह है जिसका उदाहरण आजकल बहुत कम देखने को मिलता है। यह कहानी दो अजनबी इंसानों की है जो एक खास मकसद से मिलते हैं और कुछ ऐसा होता है जो दूसरों के लिए मिसाल बन जाता है।
विज्ञापन

(स्टोरी साभारः इंड‌ियन एक्सप्रेस)

तीन दानकर्ता डरकर वापस चले गए तब आगे आए थे जॉन

प्रोसेफर जॉन दोबारा अपनी केरल यात्रा 21 दिसंबर को आरंभ करेंगे। इस बार जॉन के केरल जाने का कारण होगा 'किडनी दान'। जॉन एक पूरी तरह से अजनबी शख्स को कोची(केरल की राजधानी) के लेकशोर अस्पताल में अपनी किडनी दान करेंगे।

ये कहानी शुरु होती है जुलाई से जब 44 साल के पॉल को डॉक्टरों ने ये बात कह दी थी कि अगर कोई किडनी दानकर्ता नहीं मिला तो उसके जीवन को खतरा हो सकता है। इसके बाद पॉल के गांव ने एक समिति का गठन किया जिसने 22 लाख रुपए जुटाने का लक्ष्य रखा ताकि पॉल की किडनी ट्रांसप्लांट की जा सके।

समिति के इस प्रयास में एक इसाई पादरी द्वारा चलाई जा रही संस्था ने भी सहयोग किया। उनके प्रयास के कारण तीन डोनर सामने आए लेकिन बहुत ज्यादा कागजी कार्यवाहियों से डरकर वो पीछे हट गए।

उनके बाद एक और डोनर आया जो दिल्ली का प्रोफेसर जान था। जॉन खुद केरल गए और पॉल से मिले। अब वो पॉल को किडनी दान देंगे। हालांकि जॉन के ‌इस फैसले से उनका परिवार डरा हुआ है क्योंकि उन्हें लगता है कि ट्रांसप्लांट से कोई परेशानी ना हो।

जॉन को नहीं डरा सके 375 मेड‌िकल टेस्ट और सरकारी दफ्तरों के दौरे

हालांकि जॉन के हौसले को न उनका परिवार तोड़ सका और ना ही ट्रांसप्लांट के लिए जरूरी 375 मेडिकल टेस्ट, तीन केरल दौरे और कागजी कार्रवाई पूरी करने को सरकारी दफ्तरों के चक्कर। जॉन ने मजबूत इरादा कर लिया है कि वो किडनी दान देंगे।

हम आपको ये भी बता दें कि जॉन का 21 दिसंबर का दौरा आखिरी केरल दौरा नहीं होगा बल्कि सबसे महत्वपूर्ण ‌यात्रा होगी। जॉन कहते हैं कि डॉक्टरों ने बताय है कि इस केस में 95 प्रतिशत कंपैटिबिलिटी है।

पीची से जब पॉल से बात की गई तो उन्होंने कहा कि जब उन्हें पता चला कि उनकी दोनों किडनियां खराब हैं तो, वो सारी आशाएं खो चुके थे। वो बुरी तरह टूट चुके थे। पॉल अपने परिवार के इकलौते कमाऊ सदस्य हैं। उनके परिवार में पत्नी शीबी और बच्चे एल्विन और एंजेल हैं।

अब तक 98 डायलिसिस करा चुके पॉल, जॉन के आने की बात पर कहते हैं कि, जब साखी आए तो उन्हें लगा कि जैसे कोई फरिश्ता उनके लिए जिंदगी का उपहार लेकर आया है।

प‌िता की मौत से जॉन को ऐसे म‌िली क‌िडनी दान करने की प्रेरणा

- फोटो : Demo pic
जॉन के अनुसार, 'पॉल को ट्रांसप्लांट कराना था और उसके पास 5 हजार रुपए भी नहीं हैं। जुलाई में पॉल को डायलिसिस के चार सेशन कराने थे लेकिन जब तक उसका गांव आगे नहीं आया ये सब उसके लिए बहुत मुश्किल था। चूंकि पॉल बस अपनी दो गायों के दूध को बेचने के साथ ही बस भी साफ करता है तो कई ड्राइवर भी उसकी सहायता के लिए आगे आए।' इसी कठिन वक्त में पॉल किडनी फाउंडेशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष फादर डेविस चिरामल के संपर्क में आया।

केरल के थिरूवला के मूल निवासी जॉन किस वजह से पॉल को किडनी दान करने के लिए प्रेरित हुए उसकी कहानी जॉन खुद कुछ ऐसे बताते हैं- '2011 में जब मेरे पिता की मौत के बाद उनकी आंखें दान की गईं तब मैं ऑफथैल्मोलॉजिस्ट से मिला जिसने पिता की आंखों का ट्रांसप्लांट दो लोगों में किया था। उस वक्त उसने मुझे बताया था कि कैसे मेरे पिता की आंखों से दो लोग देख सकेंगे। उसी वक्त मैं ऑर्गन डोनेशन की बात सोची थी।'

इसकी एक और वजह बताते हुए जॉन कहते हैं कि, 'मैं 1992 में दिल्ली शिफ्ट हुआ। मैं लेफ्ट विंग धारा से प्रभावित था और रेलवे कॉलोनी के कामगारों के लिए काम करने लगा। बाद में मैं एक लोकल एनजीओ से जुड़ा जो स्लम के बच्चों के लिए काम करता था। जब मैंने पढ़ाना शुरु किया तो मैंने हेल्थ मैनेजमेंट में स्पेशलाइज किया। ये मेरे लिए ‌टर्निंग प्वाइंट साबित हुआ। मैं यूपी और राजस्थान के गांवों में घूमा और एड्स के मरीजों के लिए काम‌ किया। मैं अब भी ऐसा कर रहा हूं।'
विज्ञापन

जॉन शुरु से ही रहे हैं समाज सेवक

- फोटो : demo pic
2015 में जॉन फादर चिरामल से मिले और किडनी दान करने की इच्छा जताई लेकिन दो शर्तों पर। उनकी पहली शर्त थी कि वो किसी आर्थिक रूप से कमजोर शख्स को दान देंगे और दूसरी कि उनके डोनेशन को पब्लिसाइज नहीं किया जाएगा।

जॉन कितने सहृदय हैं इस बात का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पॉल क पढ़े लिखे न होने की वजह से जॉन ने ही उनका भी सारा पेपर वर्क किया। और अपने स्वास्थ्य होने की बजाय उन्हें ये चिंता बनी रही कि अगर एक भी कागजात रह गए तो पॉल को किडनी नहीं मिल पाएगी।

जॉन के परिवार को उनके स्वास्थ्य की चिंता जरूर है ल‌ेकिन उनके इस फैसले से किसी को हैरानी नहीं हुई थी। जॉन के 21 वर्षीय बेटे जोएल बताते हैं कि ये पहली बार नहीं है जब जॉन ने ऐसा फैसला लिया हो।

दो साल पहले भी जब वो लोग उत्तरी भारत के आदिवासी इलाकों की यात्रा पर थे तो जॉन ने एक आदिवासी लड़की को गोद लेने का फैसला किया था। लेकिन झारखंड के कानून के हिसाब से आदिवासी बच्चों को गोद नहीं लिया जा सकता। अब जोएल अपने पिता के सपने को पूरा करने के लिए दिल्ली यूनिवर्सिटी से सामाजिक कार्य में डिग्री ले रहे हैं।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें