दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा कि मामले की निष्पक्ष सुनवाई न सिर्फ पीड़ितों का अधिकार है बल्कि आरोपी के हित में भी शामिल है। एक तरह से यह आपराधिक कार्यवाही का हॉलमार्क के समान है। अदालत ने दहेज हत्या के मामले में निचली अदालत द्वारा आरोपी को अभियोजन पक्ष के गवाह से जिरह के अधिकार से वंचित किए जाने के मामले में उक्त टिप्पणी की है।
न्यायमूर्ति मनोज कुमार ओहरी ने कहा कि यह सुनिश्चित करने के लिए प्रत्येक अदालत की यह जिम्मेदारी है कि वह मामले में फैसला करने के लिए आरोपी को निष्पक्ष और उचित मौका प्रदान करें। आपराधिक मामले में आरोपी द्वारा अपने बचाव के समर्थन में अतिरिक्त साक्ष्य पेश करना एक मूल्यवान अधिकार है और न्याय के हित में अनुमति है।
दहेज हत्या के मामले में चल रही थी सुनवाई
दहेज हत्या के मामले में आरोपी कृष्ण कुमार ने दाखिल याचिका में निचली अदालत के दो आदेशों की चुनौती दी है। निचली अदालत ने आरोपी द्वारा अभियोजन पक्ष के गवाह से जिरह का अधिकार समाप्त करने और गवाह को दोबारा से गवाही के लिए कोर्ट में बुलाने की मांग को खारिज कर दिया था।
आरोपी ने इस मामले में मृतका के माता-पिता से दोबारा से जिरह की अनुमति मांगी थी, लेकिन निचली अदालत ने उसकी मांग को ठुकरा दिया। निचली अदालत के आदेश को चुनौती देते हुए आरोपी ने मृतका के माता-पिता से एक ही दिन जिरह की अनुमति मांगी थी।
हाईकोर्ट ने कहा है कि निसंदेह मौजूदा मामले में याचिकाकर्ता को उपरोक्त गवाह को जिरह करने का पर्याप्त अवसर था लेकिन उन्होंने इसका उपयोग नहीं किया। न्यायालय ने कहा है कि इसके बावजूद भी अदालत इस तथ्य की अनदेखी नहीं कर सकती है कि आपराधिक कार्यवाही में मामले निष्पक्ष सुनवाई परीक्षण हॉलमार्क है। इसके साथ ही उच्च न्यायालय ने आरोपी को निचली अदालत में गवाहों से जिरह करने की अनुमति दे दी।